Taj Hotel History in Hindi: बॉम्बे 1890 के दशक का दौर। भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिने जाने वाले जमशेद जी टाटा एक दिन अपने एक विदेशी मित्र से मिलने वाटसंस होटल पहुंचे। लेकिन जैसे ही वे मुख्य द्वार पर पहुंचे, दरवाजे पर खड़े एक नौकर ने उनका रास्ता रोक दिया और बोला, “सॉरी सर, आप अंदर नहीं जा सकते।” जमशेद जी यह बात सुनकर दंग रह गए।” उन्होंने कारण पूछा तब नौकर ने दरवाजे के पास लगा एक बोर्ड दिखाया। उस पर लिखा था डॉग्स एंड इंडियंस नॉट अलाउड। यहां भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है।
उस नौकर को जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस आदमी को वह अभी दरवाजे से लौटा रहा है, वो कोई साधारण भारतीय नहीं था। वो वही शख्स था, जिसके कपड़े के कारखाने से आधे बॉम्बे का चूल्हा जलता था। जिसकी गिनती देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में होती थी और जिसे आगे चलकर भारत मां अपने सबसे बड़े सपूतों में गिनने वाली थी। जरा सोचिए जिस व्यक्ति के उद्योगों से पूरा शहर चलता हो जिसके पास अपार धन दौलत और सम्मान हो उसे केवल इसलिए दरवाजे से लौटा दिया गया क्योंकि वह एक भारतीय था।

उस पल जमशेद जी ने कोई बहस नहीं की, न किसी से झगड़ा किया, न ही अपना प्रभाव दिखाने की कोशिश की। लेकिन उस अपमान ने उनके भीतर एक ऐसी आग जला दी जिसने आगे चलकर इतिहास बदल दिया। उन्होंने बदला लिया लेकिन तलवार से नहीं बल्कि एक ऐसी इमारत बनाकर जिसे देखकर अंग्रेजों की आंखें फटी की फटी रह गई। आज हम बात करेंगे एक ऐसी इमारत की जिसे लोग सिर्फ एक होटल समझते हैं।
लेकिन सच यह है कि यह सिर्फ एक होटल नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान और भारतीय गौरव का जीवित प्रतीक है। यह एक जिद की कहानी है। एक सपने की कहानी है और उस इमारत की कहानी है जिसने अपमान भी देखा, आतंक भी देखा लेकिन कभी झुकना नहीं सीखा। यह है ताजमहल पैलेस होटल। बात है 19वीं सदी के अंतिम वर्षों की पूरा भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। बॉम्बे यानी आज की मुंबई तेजी से विकसित होता हुआ व्यापारिक शहर बन चुका था। समुद्र के रास्ते दुनिया भर से जहाज आते थे।

कपास का व्यापार अपने चरम पर था और अंग्रेजी हुकूमत का प्रभाव शहर के हर कोने में दिखाई देता था। इसी शहर में रहते थे जमशेद जी नसरवान जी टाटा। एक ऐसे उद्योगपति जिनकी सोच अपने समय से कई दशक आगे थी। उन्होंने सूती कपड़े के व्यापार से बड़ी सफलता हासिल की थी और आगे चलकर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों की नींव रखने वाले थे। उनके पास धन था, प्रतिष्ठा थी, सम्मान था।
लेकिन उस दिन उनसे एक ऐसी चीज छीन ली गई जिसकी कीमत किसी भी दौलत से कहीं अधिक होती है। आत्मसम्मान। उस शांत चेहरे के पीछे जमशेद जी के दिमाग के अंदर एक बहुत बड़ा ज्वालामुखी सुलग रहा था। उन्होंने मन ही मन निर्णय लिया मैं ऐसा होटल बनाऊंगा जो दुनिया के किसी भी होटल से कम नहीं होगा जहां किसी इंसान की पहचान उसकी जाति रंग या देश से नहीं बल्कि उसके सम्मान से होगी। साल 1898 था। जमशेद जी टाटा ने मुंबई के कोलाबा क्षेत्र में समुद्र के किनारे बड़े पैमाने पर जमीन खरीदी।

जमशेद जी टाटा चाहते थे कि यह होटल किसी यूरोपीय इमारत की नकल ना हो बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक तकनीक का ऐसा संगम बने जिसे देखकर हर व्यक्ति दंग रह जाए। इसी सोच के साथ उन्होंने इस परियोजना की जिम्मेदारी दो भारतीय वास्तुकारों को सौंपी। सीताराम खंडेरा वैद्य और डी एन मिर्जा दोनों ने मिलकर एक ऐसे भवन की कल्पना की जो अपने समय से कई दशक आगे था। लेकिन किस्मत को शायद इस सपने की भी परीक्षा लेनी थी।
निर्माण कार्य अभी जारी ही था कि मुख्य वास्तुकार सीताराम खंडेराव वैद्य का अचानक निधन हो गया। पूरा प्रोजेक्ट जैसे एक पल के लिए ठहर गया। लेकिन जमशेद जी टाटा हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने तुरंत ब्रिटिश इंजीनियर डब्ल्यूए चेंबर्स को इस परियोजना से जोड़ा। ताकि अधूरा सपना रुके नहीं बल्कि पहले से भी अधिक भव्य रूप ले सके। धीरे-धीरे एक विशाल महल आकार लेने लगा।

मोरिश शैली के भव्य गुंबद, फ्लोरेंटाइन शैली की सुंदर छतरियां, राजपूताना शैली की बारीक नक्काशी और यूरोपीय वास्तुकला की शान सब एक साथ। यह केवल एक होटल नहीं बन रहा था। यह कई सभ्यताओं की कला का अद्भुत संगम बन रहा था। निर्माण के दौरान जमशेद जी टाटा पेरिस गए। वहां एफिल टावर देखा। उसकी भव्यता, उसकी इंजीनियरिंग और उसकी स्टील संरचना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
वापस लौटते समय उन्होंने उसी गुणवत्ता के स्टील से बने 10 विशाल स्तंभ मंगवाए जिन्हें बाद में ताजमहल पैलेस के भव्य बॉल रूम में लगाया गया। जरा सोचिए। जिस व्यक्ति को कभी एक होटल के दरवाजे से लौटा दिया गया था। आज वही व्यक्ति दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तकनीक अपने सपने को सजाने के लिए भारत ला रहा था। उस दौर में जब बॉम्बे के अधिकांश घरों में बिजली तक नहीं पहुंची थी। तब इस होटल में अपना स्वयं का पावर प्लांट लगाया गया।

यानी होटल अपनी बिजली खुद पैदा करता था। यहां इलेक्ट्रिक पंखे लगाए गए। आधुनिक इलेक्ट्रिक लिफ्टें लगाई गई और सबसे हैरान करने वाली बात इस होटल में उस दौर के एशिया के शुरुआती मैकेनिकल कूलिंग सिस्टम में से एक लगाया गया था। जो रोजाना लगभग 15 टन बर्फ तैयार करता था। होटल के भीतर एक डाकघर था। एक केमिस्ट की दुकान थी। स्थायी चिकित्सक की व्यवस्था थी। तुर्की स्नान घर था। यह एक होटल नहीं, अपने आप में एक जीवंत नगर बन चुका था।
अब वो दिन भी आ गया है जिसका वर्षों से इंतजार किया जा रहा था। 16 दिसंबर 1903, जब ताजमहल पैलेस ने पहली बार अपने द्वार पूरी दुनिया के लिए खोल दिए। यह गुलाम भारत के हाथों ब्रिटिश हुकूमत के मुँह पर जड़ा गया इतिहास का सबसे करारा तमाचा था। कुछ ही महीनों के भीतर बड़े-बड़े अंग्रेज अफसर राजकुमार और वायसराय वाटसंस होटल का रास्ता भूल गए और ताज की तरफ खींचे चले आए। नतीजा, तिलमिलाया हुआ वाटसंस होटल धीरे-धीरे भारी कर्ज में डूब गया और हमेशा के लिए बंद हो गया।

लेकिन इस खुशी के साथ एक गहरी उदासी भी जुड़ी थी। जमशेद जी टाटा इस सपने को साकार तो देख पाए, लेकिन इसकी सफलता का लंबा सफर नहीं देख सके। होटल के उद्घाटन के कुछ ही समय बाद 1904 में उनका निधन हो गया। लेकिन जमशेद जी टाटा के जाने के बाद भी उनका सपना रुकने वाला नहीं था। समय बीतता गया और ताजमहल पैलेस धीरे-धीरे सिर्फ एक होटल नहीं रहा। वो भारत की पहचान बन गया।
विदेशी व्यापारी, राजघरानों के सदस्य, उद्योगपति, राजनेता और दुनिया भर की प्रसिद्ध हस्तियां मुंबई आते तो ताजमहल पैलेस में ठहरना अपनी शान समझते। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी इस होटल ने इतिहास को बहुत करीब से देखा। महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और उस दौर की अनेक प्रसिद्ध हस्तियां कभी ना कभी इस होटल से जुड़ी रहीं। 1947 में भारत स्वतंत्र हो चुका था और उस नए भारत के आत्मविश्वास की झलक ताजमहल पैलेस में भी दिखाई देने लगी।

1973 में इस ऐतिहासिक भवन के बगल में एक नया आधुनिक टावर बनाया गया। जिसे ताजमहल टावर नाम दिया गया। लेकिन दोस्तों जो कहानी अब तक आपने सुनी वो सिर्फ ट्रेलर था। क्योंकि इस इमारत की सबसे डरावनी और सबसे दर्दनाक कहानी तो अभी बाकी है। 26 नवंबर 2008 को मुंबई हमेशा की तरह अपनी रफ्तार में दौड़ रही थी। ताजमहल पैलेस के भव्य हॉल में रात के भोजन की तैयारियां चल रही थी। किसी को जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ मिनट भारत के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय बनने वाले हैं।
अरब सागर के रास्ते आए लश्कर तयबा के आतंकवादी मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में फैल चुके थे और उनके निशाने पर था ताजमहल पैलेस होटल। क्योंकि यह केवल एक होटल नहीं था। यह भारत की आर्थिक शक्ति और अंतरराष्ट्रीय पहचान का प्रतीक था। रात लगभग 9:40 पर अचानक ताज होटल के भीतर गोलियों की तेज आवाज गूंज उठी। कुछ ही सेकंड में हंसी से भरा हुआ होटल खौफ के सन्नाटे में बदल चुका था। मेहमान जहां जगह मिली वहीं छिप गए।

लेकिन उसी भय के बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की। वे थे ताज होटल के कर्मचारी। उन्होंने मेहमानों को सुरक्षित बाहर निकालना अपना पहला कर्तव्य समझा। कई कर्मचारियों ने दूसरों की जान बचाते-बचाते अपनी जान तक कुर्बान कर दी। लगातार तीन दिन और तीन रातें ऑपरेशन जारी रहा। भारत ने पहली बार इतना लंबा शहरी आतंकवाद रोधी अभियान देखा था। आखिरकार 29 नवंबर 2008 की सुबह एनएसजी कमांडो ने ऑपरेशन समाप्त होने की घोषणा की।
लेकिन यह जीत भारी कीमत पर मिली थी। पूरे मुंबई हमलों में 166 निर्दोष लोगों ने अपनी जान गवाई। हमले के बाद रतन टाटा स्वयं घटनास्थल पर पहुंचे। उन्होंने सिर्फ होटल की मरम्मत की बात नहीं की। उन्होंने हमले में घायल लोगों, मृतकों के परिवारों और अपने कर्मचारियों के साथ व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की। 21 दिसंबर 2008 हमले के सिर्फ 25 दिन बाद ही होटल का वो हिस्सा जो कम क्षतिग्रस्त हुआ था दोबारा खुल गया।

लेकिन ऐतिहासिक हिस्से को पूरी तरह दोबारा खड़ा करने में सालों लगे। मार्च 2010 में जब मरम्मत का काम पूरा होने के करीब था तब होटल ने अपने नाम से टावर शब्द हमेशा के लिए हटा दिया। अब यह सिर्फ ताजमहल पैलेस कहलाया। आज भी इस होटल की लॉबी में एक स्मारक पट्टिका लगी है। जिस पर उन सभी मेहमानों और कर्मचारियों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने उस खौफनाक रात अपनी जान गंवाई थी।
साल 2017 में इस इमारत को भारत की पहली ऐसी इमारत का दर्जा मिला जिसे उसके आर्किटेक्चर डिजाइन के लिए ट्रेडमार्क सुरक्षा दी गई। एफिल टावर और सिडनी ओपेरा हाउस जैसी दुनिया की महान इमारतों की सूची में अब मुंबई का यह गुंबद भी शामिल हो चुका था। यह सिर्फ एक होटल की कहानी नहीं है। यह उस जिद की कहानी है जो एक अपमान से जन्मी और पूरे देश की शान बन गई। यह उस इमारत की कहानी है जिसने आग देखी, खून देखा, लेकिन फिर भी अपना सिर नहीं झुकाया। यही है ताजमहल पैलेस की अमरगाथा। अगर आपको यह डॉक्यूमेंट्री पसंद आई हो तो लाइक जरूर करें। ऐसी ही सच्ची, ऐतिहासिक और प्रेरणादायक कहानियों के लिए हमारे साथ जुड़े रहिए।