Tim Berners-Lee: जिसने दुनिया को Internet दिया, खुद क्यों नहीं बना Billionaire? जानिए

Tim Berners-Lee: आज सुबह जब तुमने अपना फोन उठाया, Google खोला, Instagram स्क्रॉल किया, YouTube पर कोई वीडियो देखी, तो एक बार भी नहीं सोचा होगा कि यह सब किसने बनाया? और अगर किसी ने पूछा तो शायद तुमने कहा होगा अमेरिका ने, सिलिकॉन वैली ने, जैकबर्ग ने, इलॉन मस्क ने। लेकिन सच यह है कि जिस इंटरनेट पर तुम हर रोज घंटों बिताते हो जिसके बिना आज की दुनिया एक पल भी नहीं चल सकती वो एक अकेले इंसान ने बनाया था एक अंग्रेज वैज्ञानिक ने और उसने यह पूरी दुनिया को मुफ्त में दे दिया एक रुपया नहीं लिया एक पेटेंट नहीं कराया एक शेयर नहीं रखा और आज उसका नाम तुम्हें याद भी नहीं

ये सिर्फ एक आदमी की कहानी नहीं है। यह उस सबसे बड़े सवाल की कहानी है जो इतिहास ने कभी नहीं पूछा कि जब एक इंसान पूरी दुनिया बदल दे और बदले में कुछ ना मांगे तो दुनिया उसके साथ क्या करती है? 1980 का दशक जिनेवा स्विट्जरलैंड सन दुनिया की सबसे बड़ी फिजिक्स लैबोरेटरी जहां दुनिया के सबसे तेज दिमाग काम करते थे। हर देश से, हर भाषा से, हर बैकग्राउंड से और यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी।

इतने सारे साइंटिस्ट्स, इतने सारे कंप्यूटरटर्स, इतने सारे डॉक्यूमेंट्स और कोई रास्ता नहीं था कि एक आदमी दूसरे का काम देख सके। एक कंप्यूटर दूसरे कंप्यूटर से बात कर सके। अगर किसी रिसर्चर को किसी दूसरे का डेटा चाहिए होता, तो उसे फिजिकली उसके पास जाना पड़ता। फ्लॉपी डिस्क लेकर या फिर प्रिंट निकाल कर। सोचो, दुनिया के सबसे स्मार्ट लोग और उनका सबसे बड़ा दुश्मन एक फ्लॉपी डिस्क था। इसी केओस के बीच एक 33 साल का ब्रिटिश सॉफ्टवेयर इंजीनियर था।

Tim Berners-Lee

नाम था टीम बर्नर्सली। वो कोई जीनियस बच्चा नहीं था जिसकी कहानियां टेक्स्ट बुक्स में होती हैं। वो एक ऑर्डिनरी आदमी था जो अपना काम करता था। और एक दिन उसे एक प्रॉब्लम दिखी। उसके बॉस ने उसका एक प्रपोजल पढ़ा और ऊपर लिख दिया वेग बट एक्साइटिंग। मतलब आईडिया अच्छा है, लेकिन समझ नहीं आया। आगे बढ़ाओ। टिम ने आगे बढ़ा दिया। बहुत आगे। 1989 में टिम ने एक सिस्टम बनाना शुरू किया। उसका आईडिया था कि क्या होगा अगर सारे कंप्यूटर एक-दूसरे से जुड़ जाएँ? क्या होगा अगर एक डॉक्यूमेंट में एक लिंक हो जो तुम्हें दूसरे डॉक्यूमेंट तक ले जाए? क्या होगा अगर दुनिया का सारा नॉलेज एक जगह हो और कोई भी उसे कहीं से भी देख सके

यह आईडिया था वर्ल्ड वाइड वेब का। टीम ने तीन चीजें बनाईं जो आज भी वैसी ही हैं। HTML वो भाषा जिसमें वेबसाइट्स लिखी जाती हैं। HTTP वो रास्ता जिससे डेटा एक कंप्यूटर से दूसरे तक जाता है। यूआरएल वो एड्रेस जो हर वेबसाइट का होता है। 1991 में दुनिया की पहली वेबसाइट लाइव हुई। उसका एड्रेस था, कोई डिज़ाइन नहीं था। कोई कलर नहीं था। सिर्फ प्लेन टेक्स्ट लेकिन वो टेक्स्ट दुनिया की सबसे बड़ी रेवोल्यूशन की शुरुआत थी और यहीं से असली कहानी शुरू होती है।

जब टीम ने यह सिस्टम बनाया, तो उसके सामने एक सवाल था: इसे पेटेंट कराऊं या नहीं। अगर वो चाहता तो यह कर सकता था। उस वक्त इंटरनेट की वैल्यू का अंदाजा किसी को नहीं था। लेकिन टिम को था। वो जानता था कि यह टेक्नोलॉजी एक दिन हर जगह होगी। और इसीलिए उसने पेटेंट नहीं कराया। उसने कहा, अगर मैंने इसे पेटेंट किया तो हर वेबसाइट बनाने वाले को मुझे पैसे देने होंगे। हर ईमेल भेजने वाले को हर बार जब कोई इंटरनेट यूज करे और तब यह टेक्नोलॉजी कभी वो नहीं बनेगी जो मैं चाहता हूं।

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उसने वेब को दुनिया को फ्री में दे दिया। कोई रॉयल्टी नहीं, कोई लाइसेंस फी नहीं, कोई शर्त नहीं। बस एक सपना कि दुनिया का हर इंसान नॉलेज तक पहुंच सके। चाहे वो अमीर हो या गरीब। चाहे वो अमेरिका में हो या इंडिया के किसी छोटे से गांव में। लेकिन दुनिया ने इस जेनेरसिटी के साथ क्या किया? 1994 में एक 30 साल के लड़के ने एक ऑनलाइन बुक स्टोर बनाया। नाम रखा Amazon। उसका नाम था जेफ बेज़ोस। 1998 में दो पीएचडी स्टूडेंट्स ने एक सर्च इंजन बनाया। नाम रखा Google। उनके नाम थे लेरी पेज और सरगे ब्रिन।

2004 में एक कॉलेज स्टूडेंट ने एक सोशल नेटवर्क बनाया। नाम रखा Facebook। उसका नाम था मार्क ज़करबर्ग। यह सब उस फ्री वेब पर बना। उसी टेक्नोलॉजी पर जो टिम ने बिना एक पैसा लिए दुनिया को दी थी। आज जेफ बेज़ोस की नेटवर्थ 200 बिलियन से ज़्यादा है। Google की वैल्यू है 2 ट्रिलियन। मार्क ज़करबर्ग अरबों में खेलता है और टीम बर्नर्स ली वो आज भी एक प्रोफेसर की तरह काम करता है एक यूनिवर्सिटी में एक साधारण सैलरी पर वो दुनिया का सबसे बड़ा इन्वेंशन करने वाला इंसान है और वो उस इन्वेंशन से कुछ नहीं कमाया

लेकिन यहां एक और मोड़ है जो तुम्हें जानना चाहिए। टीम ने जो वेब बनाया था वो खुला था। आज़ाद था, किसी का नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे वो वेब बदलने लगा। जो कंपनीज़ उस फ्री वेब पर बनी थीं, वो उसी वेब को बंद करने लगीं। Facebook ने एक ऐसी दुनिया बना दी जहां तुम्हारा हर क्लिक ट्रैक होता है। हर लाइक रिकॉर्ड होता है। हर थॉट एनालाइज होता है और फिर एडवरटाइजर्स को बेचा जाता है। Google ने तुम्हारी हर सर्च सेव की। तुम्हारी लोकेशन ट्रैक की। तुम्हारी पूरी लाइफ का डाटा इकट्ठा किया।

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वो वेब जो टिम ने इंसान की आजादी के लिए बनाया था। वो धीरे-धीरे [संगीत] एक ऐसी जगह बन गया जहां तुम खुद एक प्रोडक्ट हो। टीम ने यह देखा और वो टूट गया। उसने कहा, “यह वो वेब नहीं है जो मैंने बनाया था। मैंने एक ओपन फ्री इक्वल स्पेस बनाया था। यह उसके साथ बिछड़ना है। आज 70 साल की उम्र में टीम बर्नर्स ली अपनी उसी वेब को फिर से बचाने की कोशिश कर रहा है। एक नया प्रोजेक्ट है उसका सॉलिड जिसमें तुम्हारा डाटा तुम्हारा रहे। किसी कंपनी का नहीं।

एक आदमी जिसने दुनिया को सबसे बड़ा तोहफा दिया, वो आज उसी तोहफे को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। कभी-कभी मैं सोचता हूं अगर टिम ने 1991 में पेटेंट करा लिया होता हर वेबसाइट के लिए फी लेता हर ईमेल के लिए चार्ज करता तो आज वो ईलॉन मस्क से भी अमीर होता। शायद दुनिया का सबसे अमीर इंसान। लेकिन तब शायद यह वेब कभी वो नहीं बनता जो बना। शायद छोटे देशों के बच्चे कभी इंटरनेट एक्सेस नहीं कर पाते। शायद वो छोटा सा लड़का जो बिहार के किसी गांव में YouTube पर पढ़ाई करता है वो कभी नहीं पढ़ पाता। टीम ने एक ट्रेड ऑफ किया।

दुनिया के लिए अपनी दौलत छोड़ दी और दुनिया ने उसे भुला दिया। आज जब तुम इंटरनेट यूज़ करते हो एक सेकंड के लिए रुको। उस आदमी को याद [संगीत] करो जिसने यह सब बनाया। जिसने इसे फ्री में दे दिया जिसे दुनिया ने कभी वो क्रेडिट नहीं दिया जिसका वो हकदार था। टिम बर्नर्स-ली। कुछ लोग दुनिया को बदलने के लिए पैसा नहीं मांगते, वो बस बदल देते हैं और शायद यही सबसे बड़ी बात है। धन्यवाद।