Vijayanagara Empire History: नमस्कार दोस्तों, कल्पना कीजिए एक ऐसे शहर की जिसे देखकर विदेशी यात्री हैरान रह जाते थे। जो उस दौर के सबसे बड़े और सबसे अमीर शहरों में गिना जाता था। जहां हीरे और मोती उतनी आसानी से बिकते थे जितनी आसानी से किसी आम बाजार में सब्जियां और फल बिकते हैं। और अब सोचिए कि वही शहर कुछ ही महीनों में खंडहर बनकर रह गया। यह कहानी है हम्पी की विजयनगर साम्राज्य की राजधानी जिसका उठना जितना हैरान करने वाला था उसका गिरना उतना ही दुखद। बात है 14वीं सदी के आसपास की।
दक्षिण भारत में उस वक्त दिल्ली की सल्तनत की सेनाएं लगातार हमले कर रही थी और कई छोटे-छोटे हिंदू राज्य टूट चुके थे। ऐसे मुश्किल दौर में दो भाइयों हरिहर और बुकराय ने तुंगभद्रा नदी के किनारे एक नए साम्राज्य की नींव रखी। कहा जाता है कि इन दोनों भाइयों को एक संत की सलाह और मदद मिली थी। जिन्होंने उन्हें इस नए राज्य को खड़ा करने के लिए प्रेरित किया। यही साम्राज्य आगे चलकर विजयनगर के नाम से जाना गया। यानी जीत का शहर और इसकी राजधानी बनी हम्पी। शुरुआती सालों में विजयनगर को कई लड़ाईयां लड़नी पड़ी।

अपनी सरहदों को बचाना पड़ा और धीरे-धीरे यह साम्राज्य मजबूत होता गया। यही साम्राज्य आगे चलकर विजयनगर के नाम से जाना गया। अगले 200 सालों में विजयनगर साम्राज्य ने बहुत तरक्की की। कई राजाओं ने इस पर राज किया और इसका इलाका लगातार बढ़ता गया। लेकिन इसका सबसे शानदार दौर आया 16वीं सदी की शुरुआत में जब गद्दी पर बैठे कृष्णदेव राय जिन्हें आज भी दक्षिण भारत के सबसे बड़े राजाओं में गिना जाता है। कृष्णदेव राय सिर्फ एक अच्छे योद्धा ही नहीं थे बल्कि कला, साहित्य और संगीत के भी बहुत बड़े जानकार थे।
उनके दरबार में आठ बड़े कवि रहते थे। जिन्हें अष्टदिग्गज कहा जाता था। खुद कृष्णदेव राय ने भी तेलुगु भाषा में एक बड़ा ग्रंथ लिखा था। उनके राज में हम्पी दुनिया के सबसे अमीर और सबसे बड़े शहरों में से एक बन गया। कहा जाता है कि उस दौर में हम्पी की आबादी 5 लाख से भी ज्यादा थी जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी संख्या थी। उस दौर के लंदन या पेरिस जैसे बड़े यूरोपीय शहरों से भी ज्यादा। उस दौर में भारत आए पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस ने हम्पी को देखकर लिखा था कि यह शहर उस समय के रोम जितना बड़ा और उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत था।

उन्होंने यह भी लिखा कि यहां के बाजारों में हीरे, मोती और सोना इतनी ज्यादा मात्रा में मिलते थे कि उन्हें भी तराजू में तौलकर आम चीजों की तरह बेचा जाता था। बिल्कुल वैसे ही जैसे आज बाजार में सब्जियां तौल कर बेची जाती हैं। एक और विदेशी यात्री फारसी दूत अब्दुल रजाक जो 15वीं सदी में हम्पी आया था। उसने भी लिखा कि उसने अपनी पूरी जिंदगी में ऐसा शानदार शहर कभी नहीं देखा। हम्पी की इमारतें भी उतनी ही अनोखी थीं जितनी वहां की दौलत। विट्ठल मंदिर परिसर में बना पत्थर का रथ इतनी बारीकी से बनाया गया कि आज भी लोग इसे देखकर हैरान रह जाते हैं।
लेकिन इसी मंदिर परिसर का सबसे रहस्यमयी हिस्सा इसके संगीतमय खंभे हैं। मंदिर के मुख्य हॉल में 52 ऐसे खंभे हैं कि उन पर हल्के से थपकी मारने पर हर खंभे से एक अलग सुर निकलता है। बिल्कुल भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात सुरों जैसा। जैसे सा रे गा मा पा धा नी सदियों से यह सवाल बना हुआ है कि उस दौर के कारीगरों ने बिना किसी आधुनिक औजार के पत्थर के अंदर इतनी बारीकी से खोखलापन कैसे बनाया कि हर खंभा एक अलग साज की तरह आवाज करें। अंग्रेजों ने बाद में कुछ खंभों को काटकर अंदर देखने की कोशिश भी की थी।

यह जानने के लिए कि कहीं अंदर कोई खोखली नली तो नहीं है। लेकिन अंदर सिर्फ ठोस पत्थर ही मिला। कोई छिपी हुई तरकीब नहीं। हम्पी की दौलत सिर्फ मंदिरों और बाजारों तक सीमित नहीं थी। यहां की पानी की व्यवस्था, तालाब और शाही स्नानघर उस दौर की सबसे बढ़िया इंजीनियरिंग की मिसालें थीं। राजा का महल, हाथियों का अस्तबल और रानी का स्नानघर आज भी उस समय की शान की गवाही देते हैं। बाजारों की बात करें तो हम्पी में एक नहीं बल्कि कई बड़े बाजार थे। जहां देश विदेश से व्यापारी आते थे। कपड़ा, मसाले, हीरे-जवाहरात, घोड़े, हर तरह का सामान यहां बिकता था। अरब देशों से घोड़े मंगाए जाते थे।
क्योंकि उस दौर में अच्छी नस्ल के घोड़े सेना के लिए बहुत जरूरी माने जाते थे। लेकिन यह शान हमेशा के लिए नहीं टिकी। कृष्णदेव राय की मौत के बाद साम्राज्य में धीरे-धीरे राजनीतिक गड़बड़ी बढ़ने लगी। गद्दी को लेकर परिवार में खींचतान शुरू हो गई और कमजोर शासकों की वजह से साम्राज्य की ताकत धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। इसी दौरान दक्कन के इलाके में पाँच मुस्लिम सल्तनतें थीं। बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, बीदर और बरार जो अक्सर आपस में ही लड़ती रहती थीं। लेकिन विजयनगर की बढ़ती ताकत और दौलत उन सबके लिए एक साझा खतरा बन चुकी थी।

साल 1565 में ये पाँचों सल्तनतें पहली बार एक साथ आईं और विजयनगर के खिलाफ एक बड़ी सेना खड़ी की। यह लड़ाई इतिहास में तालीकोटा के युद्ध के नाम से जानी जाती है, जो कृष्णा नदी के किनारे लड़ी गई थी। विजयनगर की सेना संख्या में कहीं ज्यादा बड़ी थी। कहा जाता है कि उनके पास 1 लाख से भी ज्यादा सैनिक थे। लेकिन लड़ाई के बीच में सेना के दो बड़े सेनापति जो मूल रूप से मुस्लिम थे और जिन्हें विजयनगर की सेना में ऊंचा ओहदा मिला हुआ था। अचानक पाला बदलकर दुश्मन की तरफ चले गए। इस धोखे ने पूरी लड़ाई का रुख ही पलट दिया।
विजयनगर के उस वक्त के राजा रामराय, जो बूढ़े हो चुके थे, लेकिन युद्ध की कमान खुद संभाल रहे थे। लड़ाई के मैदान में ही पकड़ लिए गए और उनके सिर काट दिए गए। उनके सिर को एक भाले पर टांग कर पूरे मैदान में घुमाया गया ताकि बाकी [संगीत] बची सेना पूरी तरह हिम्मत हार जाए। यह देखकर बची हुई सेना और आम लोगों में भगदड़ मच गई और सब कुछ बिखर गया। लेकिन असली मुसीबत लड़ाई के बाद शुरू हुई। दुश्मन की सेनाएं हम्पी में घुस गईं और अगले 5 से 6 महीनों तक शहर को पूरी तरह लूटा और तबाह किया।

मंदिरों में रखी सोने चांदी की मूर्तियां उखाड़ दी गई। महलों में आग लगा दी गई और जो कुछ भी कीमती था उसे लूट लिया गया। जिन इमारतों को लूटा नहीं जा सकता था उन्हें जानबूझकर तोड़ दिया गया ताकि विजयनगर की शान का कोई निशान बाकी ना बचे। बहुत सी मूर्तियों के चेहरे और हाथ जानबूझकर तोड़े गए हैं, जो आज भी हम्पी के खंडहरों में देखे जा सकते हैं। एक ऐसा शहर जिसे कुछ दशक पहले तक दुनिया के सबसे अमीर शहरों में गिना जाता था। कुछ ही महीनों में मलबे के ढेर में बदल गया।
जो [संगीत] लोग बच निकलने में कामयाब रहे, वे शहर छोड़कर चले गए और हम्पी हमेशा के लिए वीरान हो गया। इसके बाद इसे कभी दोबारा राजधानी के तौर पर नहीं बसाया गया। विजयनगर साम्राज्य आगे भी कुछ सालों तक अलग-अलग जगहों से चलता रहा। लेकिन वह पहले जैसी ताकत और शान कभी वापस नहीं पा सका। सदियों तक हम्पी के खंडहर [संगीत] घने जंगलों और झाड़ियों में दबे रहे। लगभग भुला दिए गए। स्थानीय लोग इन खंडरों के बारे में जानते तो थे, लेकिन इनकी असली अहमियत किसी को नहीं पता थी।

19वीं सदी में जाकर पुरातत्वविदों ने इन खंडरों को फिर से खोजा और इनका अध्ययन शुरू किया। धीरे-धीरे यह पता चला कि यह कोई मामूली खंडर नहीं, बल्कि एक समय के सबसे ताकतवर और सबसे अमीर साम्राज्य के अवशेष हैं। आज हम्पी यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और हर साल हजारों पर्यटक इन खंडरों को देखने आते हैं। पत्थर का रथ, संगीतमय खंभे, टूटे हुए मंदिर, वीरान महल और सुनसान बाजार गलियां। यहां घूमते हुए आज भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि कभी यह जगह कितनी गुलजार रही होगी।
यह जगह आज भी चुपचाप वो कहानी सुनाती है कि कैसे एक साम्राज्य जो कभी दुनिया की सबसे बड़ी दौलत का केंद्र था। सिर्फ एक लड़ाई और आपसी धोखे की वजह से हमेशा के लिए मिट्टी [संगीत] में मिल गया। हम्पी की यह कहानी हमें सिखाती है कि कोई भी साम्राज्य चाहे वह कितना भी ताकतवर और अमीर क्यों ना हो अगर एकता और सतर्कता खो दे अगर अपने ही लोगों पर आंख मूंदकर भरोसा कर ले तो उसका पतन उतनी ही तेजी से हो सकता है [संगीत] जितनी तेजी से उसका उठना हुआ था।

ताकत और दौलत कभी भी किसी साम्राज्य को हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रख सकती अगर उसके अंदर की एकता कमजोर हो जाए। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो लाइक करें, और कमेंट में बताइए आप अगली बार किस खोए हुए साम्राज्य की कहानी सुनना चाहेंगे। मिलते हैं तब तक के लिए, जय