History of India: सन 1800 यह वह दौर था जब देश में मराठा और मुगल सल्तनत बिखर रही थी और अंग्रेज भारत में अपनी जड़ों को मजबूत कर चुके थे यह वह दौर था जब अफगानिस्तान से लेकर मयांमार तक एशिया के सबसे बड़े हिस्से में सिर्फ भारत ही भारत हुआ करता था। यह वो दौर था जब भारत की आबादी सिर्फ 17 करोड़ थी। जिनमें से करीब 10 प्र पुरुष और 1 प्र महिलाएं ही पढ़ी लिखी हुआ करती थी। शायद इसी वजह से, मीलों दूर से आए अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा जमा लिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने गरीबों और किसानों का शोषण शुरू कर दिया था।
और सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस दौर में आम भारतीयों की जिंदगी आखिर कैसे हुआ करती थी? उनका रहन-सहन और पहनावा कैसा होता था? उस दौर के भारतीय लोग क्या काम किया करते थे और कैसे अंग्रेजों ने भारत के मन साम्राज्य की हुकूमत को अपने कब्जे में लिया था। अगर हां तो आज का आर्टिकल आपके लिए खास है क्योंकि आज हम सन 1800 के दौरान अखंड भारत के इतिहास से पर्दा उठाएंगे जिसे ज्यादातर स्कूलों कॉलेजों में पढ़ाया नहीं जाता है।

सल्तनत और हुकूमत 16वीं शताब्दी की शुरुआत में जब अंग्रेजों ने भारत में दस्तक दी तो शुरुआत में उनका उद्देश्य सिर्फ सर्फ यहां व्यापार करना था। लेकिन जब देश के कई महान राजा उनकी मीठी बातों के शिकार नहीं हुए तो उन्होंने इस महान देश की सत्ता पर ही कब्जा करने का फैसला किया बता दें कि भारत में कदम रखने वाली सबसे पहली ब्रिटिशर्स टोली के कैप्टन थे। विलियम हॉकिंस जिन्होंने 24 अगस्त 1608 के दिन सूरत के बंदरगाह पर पहला कदम रखा था और कुछ ही समय में उन्हें यह अंदाजा लग गया था।
कि वह कूटनीति से भारत को अपने कब्जे में कर सकते हैं 1631 में जब शाहजहाँ ताजमहल बनवा रहे थे। तभी अंग्रेज भारत में अपने पैर पसारने की कोशिश में लगे हुए थे। उस वक्त कुछ छोटे-बड़े राजाओं के अलावा भारत में दो बड़े साम्राज्य की हुकूमत चलती थी। जिनमें पहला था औरंगजेब का मुगल साम्राज्य और दूसरा था मराठा साम्राज्य। ये दोनों शक्तियां इतनी ताकतवर थीं। कि इनके सामने अंग्रेज चाय कम पानी थे मगर इनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। एक दूसरे से नफरत जो देख अंग्रेज एक तरफ इन दोनों सल्तनत के राजाओं के तलवे चाटते रहे और यह जताने की कोशिश करते रहे कि हम आपके साथ हैं।

लेकिन दूसरी तरफ बड़ी चालाकी से कूटनीति करके इन दोनों साम्राज्य में कई लड़ाइयां करवाई और खुद बाजी मारने के लिए सही मौके का इंतजार करते रहे। अपनी इसी मंत्रा में कामयाब होने में अंग्रेजों को 100 साल लग गए और शुरुआत हुई 18वीं सदी की जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने पैर पसार लिए थे। मुगलों की सल्तनत खत्म होने के कगार पर थी और मराठा साम्राज्य भी कई इलाकों में अंग्रेजों से हार चुका था। एक तरफ वह गरीबों और किसानों का शोषण कर रहे थे दूसरी तरफ शिक्षा और पैसों के लालच देकर युवा भारतीयों को ही अपनी ब्रिटिश आर्मी में भर्ती करना शुरू कर दिया था।
वह भारतीय व्यापारियों से बहुत ज्यादा कर वसूलते थे उन्होंने यहां पर अपनी फैक्ट्रीज खोल रखी थी जहां सस्ते में बना माल एक्सपोर्ट करके व अंधा दूध पैसा छाप रहे थे और यह पूरा पैसा भारत से सीधा ब्रिटेन जाता था। जिस वजह से भारत में आर्थिक संकट के दौर की शुरुआत हुई भारतीयों की कमाई पैसों की किल्लत और लगान आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि मेरी जरूरतें कम है। इसलिए मेरे जमीर में दम है जो 1800 के दौर में 90 प्र भारतीयों के लिए सही साबित होती है हालांकि हमारे भारतीय समाज में मौका परस्त लोगों का वजूद हमेशा से बना रहा है।

उस वक्त भी कुछ मौका परस्त लोग ऐसे थे जो अंग्रेजों के तलवे चाट करर अधिक कमाई किया करते थे जबकि आम भारतीय अपनी सभी जरूरतें पूरी तक नहीं कर पाते थे। एक तरह जमींदार किसानों को कर्ज़ देकर ज़्यादा ब्याज लेकर उन्हें लूटा करते थे। वहीं दूसरी तरफ किसान बाढ़ सूखे जैसी समस्याओं का सामना करते थे और अंग्रेजों द्वारा लगाया गया जानलेवा लगान तो किसानों की कमर ही तोड़ देता था। वही जो लोग खेती नहीं करते थे उनमें से कुछ छोटा-मोटा व्यापार करते थे।
जिन्हें अंग्रेज टैक्स और हफ्ता वसूली करके लूटने से बाज नहीं आते थे जबकि कुछ लोग मजबूरी में चंद पैसों के लिए अंग्रेजों की फैक्ट्रीज में 16-1 घंटे काम किया करते गांव का व्यापार उस दौर के भारत की एक चीज बहुत अच्छी थी वह है बार्टर सिस्टम यानी सामान के बदले सामान देना इसका इस्तेमाल भारत में ज्यादातर गांव में किया जाता था। गांव में अगर कोई एक आदमी चावल उगाता था तो वह दूसरे आदमी से चावल के बदले गेह लेता था जो आदमी सब्जी उगाता था उन सब्जियों के बदले चावल और गेहूं ले लेता था।

जैसे कि 1 किलो धान के सामने 4 किलो शक्कर पूरे महीने के अनाज के सामने पूरे महीने की सब्जियां और 5 किलो गेहूं के बदले 5 किलो दाल इससे फायदा यह होता था कि खाने पीने की हर चीज गांव में मिल जाती थी और इसके लिए पैसे चुकाने की जरूरत भी नहीं थी। इसलिए गांव में पैसे का चलन बहुत कम था इसके साथ आज भी अगर आप भारत के कुछ गांव में जाएंगे तो वहां पर अदला बदली की प्रथा मिलेगी जो बहुत अच्छी है। पहनावा दोस्तों आज के मॉडर्न भारत में जहां हर तरफ पश्चिमी सभ्यता यानी वेस्टर्न कल्चर का असर दिखाई देता है।
लोग जींस, शर्ट, टी-शर्ट, टॉप और सूट पहने नज़र आते हैं, लेकिन एक समय था। जब भारतीयों का अपना अलग ही देसी पहनावा हुआ करता था पुरुष सादी धोती और गमछा पहनते थे औरतें साड़ी पहनती थी और छोटे बच्चे ज्यादातर निक्कर में खेलते कूदते नजर आते थे कुछ लोग धोती और कुर्ता पहनते थे जबकि कुछ बड़े जमींदार ही अंग्रेजी पहनावा यानी जींस और शर्ट पहनते थे। भारत की यही सादगी और विविधता उन्हें अंग्रेजों से खास बनाती थी। यहां तक कि आज भी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में रहने वाले कुछ बड़े बुजुर्ग उस वक्त का सादा पहनावा पहनते हुए देखे जा सकते हैं।

लेकिन हम में से ज्यादातर युवाओं को आज लुंगी पहनना नहीं आता जो थोड़ा निराशा जनक जरूर है व्यवहार रहन-सहन और काम धंदा आज इंसान चांद पर पहुंच गए मंगल ग्रह पर रोवर भेज चुके हैं और फिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने दुनिया को बदल कर रख दिया लेकिन सन 1800 के आसपास भारत में टेक्नोलॉजी का कोई नामो निशान नहीं था लेकिन हर भारतीय का जीवन सुकून से भरा था बात करने के लिए तार से जुड़ा टेलीफोन तक नहीं था लेकिन दिल से दिल का कनेक्शन मजबूत था रिश्तेदारों से महीनों और कई सालों तक मिलना मुश्किल था लेकिन मन में इज्जत और लगाव जरा भी कम नहीं था।
सांस, फूस और मिट्टी से बने घर ही कच्चे थे, लेकिन लोगों के दिल बड़े सच्चे थे। यातायात के सिर्फ बैलगाड़ी साधन थी लेकिन लोगों के शरीर में बहुत पूर्ती थी जेब में पैसों की फूटी कौड़ी ना हो इसलिए चेहरे पर शिकन नहीं थी और भाईचारा ऐसा था कि एक आवाज पर पूरे गांव की भीड़ इकट्ठा हो जाती थी। मित्रों उस दौर में जमीन छोटी हुई या बड़ी ज्यादातर लोग खेती करना ही पसंद करते थे और भारतीय किसानों की पसंदीदा फसल नील कॉटन अफीम गेहूं और धान ही हुआ करती थी। जिसे किसानों से खरीद करर अंग्रेज विदेशी मार्केट में अच्छी कीमतों पर बेचते थे।

लोग खेती के साथ पशुपालन भी करते थे, जो लोग खेती नहीं करते थे। वह अंग्रेजों की फैक्ट्री में काम किया करते शाम होते ही सभी लोग अपने घर में आकर भजन कीर्तन और सत्संग किया करते थे। लेकिन घरों में दिए भी जलाए जाते थे, क्योंकि इस दौर में भारत में लाइट नहीं थी। फिर लोग रात में जल्दी सो जाते और सुबह जल्दी उठकर काम पर चले जाते 18वीं सदी के लोग बुजुर्गों का बहुत मान सम्मान करते थे और घर से लेकर गांव में वही होता था। जो बड़े बुजुर्ग कहते थे हालांकि वह एकसा दौर था। जब भारत में सबसे ज्यादा जातीय भेदभाव होता था।
अलग-अलग धर्मों में थोड़ा बहुत टकराव होना आम था लेकिन एक ही धर्म में भी जाति व्यवस्था को माना जाता था। यह जातियां हिंदुओं को चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित करती थी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुत्र जिनमें दलितों और बाकी छोटी जातियों के साथ काफी भेदभाव किया जाता था और यह भेद भाव तो पिछले 200 वर्षों से चला आ रहा था। जिसके खिलाफ डॉकर बाबा साहब अंबेडकर ने काफी बड़ी जंग लड़ी थी और 20वीं सदी में देश में क्रांति ला दी लेकिन उन्होंने इस भेदभाव को कैसे खत्म किया जानने के लिए आप हमारी डॉक्टर अंबेडकर की अनसुनी अन कई कहानियों वाली सीरीज देख सकते हैं।

जिसके लिंक डिस्क्रिप्शन में है फिलहाल मुद्दे पर वापस आएं तो उस दौर में अंग्रेजों ने ही डिवाइड एन रूल नियम को अपनाकर भारतीयों की एकता को भंग करने के लिए जातिवाद और ज्यादा इसका बढ़ा ब दिया लोग अपनी जाति के हिसाब से ही काम किया करते जैसे कि धोबी कपड़े धोते खम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते नाई हर पीढ़ी बाल काटती थी इस तरह हर कोई अपने हिसाब से काम धंधा किया करता था आबादी और इलाका आज भारत की जनसंख्या विश्व में सबसे ज्यादा यानी 145 करोड़ के पार कर चुकी है लेकिन उस वक्त के अखंड भारत की जनसंख्या सिर्फ 17 करोड़ थी।
वो भी सिर्फ कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले भारत में नहीं बल्कि अखंड भारत में 17 करोड़ लोग ही रहते थे जो हिंदुस्तान के साथ पाकिस्तान बांग्लादेश वर्मा और अफगानिस्तान से मिलकर बना हुआ था। आज मुंबई दिल्ली और बंगलर जैसी मेट्रो सिटीज में लोग घंटू ट्रैफिक में बिता देते हैं और शहरों में हर तरफ खूब भीड़भाड़ देखने को मिलती है। वहीं उस वक्त ऐसा कुछ नहीं था। लोकल मार्केट के अलावा किसी भी इलाके में भीड़भाड़ नहीं होती थी। देश के बड़े हिस्से में घने जंगल फैले हुए थे। बड़े-बड़े जंगलों के बीच छोटे-छोटे गांव बसे होते थे और शहरी इलाके बहुत ही कम हुआ करते थे।

इस वजह से भारत अनगिनत जंगली जानवरों का घर था और इंसानों को हर समय इन जानवरों के हमले का डर सताता रहता था। लोग रात को सोने से पहले अपने घर में आग जलाते थे ताकि अंधेरे से कोई भी जंगली जानवर आकर उन पर हमला ना कर सके हालांकि इन जंगली जानवरों की वजह से समग्र भारत में प्रदूषण का नामो निशान नहीं था। उपजाऊ जमीन की भरमार थी लोग पोषक तत्त्वों से भरपूर शुद्ध खाना खाते थे आज की तरह फलों और सब्जियों में केमिकल मिलाने का कोई सवाल ही नहीं था सड़कों की हालत भले ही खस्ता थी।
लेकिन लोगों की जिंदगी खुशहाल थी; उस वक्त के भारतीयों की औसत उम्र भी आज से काफी ज्यादा हुआ करती थी। शिक्षा और साक्षरता अब बात करें पढ़ाई लिखाई की तो आपको जानकर हैरानी होगी कि उस वक्त भारत में पढ़े लिखे लोगों की संख्या बहुत ही कम थी। देश में सिर्फ 10 प्र पुरुष और 1 प्र महिलाएं ही साक्षर थी हालांकि बिना पढ़ाई लिखाई के ही भारत में रहने वाले सभी लोग किसी ना किसी काम में बहुत निपुण थे कुल मिलाकर उस वक्त में भारत की कुछ चीजें बेहद अच्छी थी तो कुछ बहुत खराब कहीं पर लोग बहुत खुश थे।
तो कहीं बहुत दुखी लेकिन भारत हो या दुनिया का कोई भी देश सदियों से संतुलन बनाए रखने के लिए कुदरत यही नियम चलता आया है। तो मित्रों, अगर आपको भी अखंड भारत के महान इतिहास पर गर्व है। तो कमेंट बॉक्स में हमारे देश की तारीफ में दो बोल जरूर लिखिए और यह भी बताइए कि उस दौर की वो खासियत जो आज का मॉडर्न जमाना मिस कर रहा है। जय हिंद जय भारत।