Golconda Fort History in Hindi: 1526 पानीपत की लड़ाई अभी-अभी खत्म हुई थी। बाबर ने हिंदुस्तान जीत लिया था। पूरा उत्तर भारत मुगलों के नाम हो चुका था। लेकिन दक्षिण में एक शहर था। एक किला था जो किसी के सामने नहीं झुका। उसका नाम था गोलकुंडा। और उस शहर के पास एक ऐसा रहस्य था जिसके लिए बाद में मुगल, पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेज सब पागल हुए। लेकिन आज से 700 साल पहले यह सब कुछ नहीं था।
सिर्फ एक पहाड़, एक चरवाहा और एक मूर्ति। 13वीं सदी। दक्कन के पठार पर जहां आज हैदराबाद है, एक ऊंची ग्रेनाइट की पहाड़ी थी। वहां एक चरवाहा लड़का रोज अपनी बकरियां लेकर जाता था। एक दिन उसे पहाड़ी की चोटी पर एक पत्थर की मूर्ति मिली। उसने जाकर अपने काकतीय राजा को बताया। राजा ने उस पहाड़ी को पवित्र माना। वहां एक छोटा मिट्टी का किला बनवाया गया। गोलाकोंडा। तेलुगु में मतलब गोल पहाड़।

यही नाम आगे चलकर दुनिया के नक्शे पर दर्ज हुआ। लेकिन वो मिट्टी का छोटा किला एक दिन 120 मीटर ऊंची पहाड़ी पर खड़े उस विशाल किले में बदलेगा जिसकी दीवारें 10 किलोमीटर तक फैली होंगी यह उस चरवाहे ने सोचा भी नहीं था। 1518 में बहमनी सल्तनत टूट रही थी। दक्कन में पाँच नई सल्तनतें उभर रही थीं। इन्हीं में से एक थी कुतुबशाही सल्तनत।
सुल्तान कुली कुतुबशाह पहले बहमनी सल्तनत का एक गवर्नर था। उसने गोलकोंडा को अपनी राजधानी बनाया और जो मिट्टी का किला था उसे उसने पत्थर में बदलना शुरू किया। ग्रेनाइट की विशाल दीवारें, ऊंचे मजबूत दरवाजे। अगले 170 साल तक सात कुतुबशाही राजाओं ने इस किले का निर्माण करते रहे। हर राजा ने कुछ जोड़ा। हर पीढ़ी ने इसे और मजबूत किया। और जो किला बनकर तैयार हुआ, वह सिर्फ एक किला नहीं था।

वो एक शहर था। किले के अंदर महल थे, मस्जिदें थीं, बाजार थे, बाग थे, तालाब थे। हजारों लोग किले की दीवारों के भीतर रहते थे। लेकिन गोलकोंडा की असली ताकत उसकी दीवारों में नहीं थी। उसकी असली ताकत थी उसकी जमीन के नीचे। गोलकोंडा के आसपास की खाने कुल्लूर, पन्नर और कई और यह दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे अमीर हीरे की खाने थी। 17वीं सदी तक दुनिया में जितने भी हीरे थे, वे सब यहीं से निकलते थे। सिर्फ यहीं से।
एक फ्रांसीसी यात्री जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर जो 1650 के दशक में यहां आया उसने अपनी डायरी में लिखा कि उसने यहां 60 हजार से ज्यादा मजदूरों को खानों में काम करते देखा और हीरे इस तरह मिलते थे जैसे आम नदियों में कंकड़ उन खानों से जो हीरे निकले उनके नाम आज भी दुनिया के सबसे ताकतवर संग्रहालयों और शाही खजानों में दर्ज है। कोहिनूर, होप डायमंड और लोव, नूरुलैन।

यह सब इसी मिट्टी की देन है और इन्हीं हीरों के लिए दुनिया के राजाओं ने गोलकुंडा की तरफ नजरें घुमाई, लालच जगी, साजिशें बुनी गई। अब जरा उस किले की बात करें जो आज भी खड़ा है। गोलकुंडा किले में एक ऐसी चीज है जिसे देखकर आज के इंजीनियर भी हैरान रह जाते हैं। किले के मुख्य दरवाजे को फतेह दरवाजा कहते हैं। अगर आप एक ताली बजाएं, बस एक ताली। तो वो आवाज 1 कि.मी. दूर किले की सबसे ऊंची चोटी पर साफ सुनाई देता है।
बिना किसी माइक के, बिना किसी तार के, बिना किसी आधुनिक तकनीक के। 400 साल पहले के कारीगरों ने दीवारों और गलियारों को इस तरह बनाया था कि आवाज उनके बीच से गुजरती हुई ऊपर तक पहुंचती थी। दुश्मन का एक कदम और राजा को खबर मिल जाती थी। यही नहीं किले में पानी की ऐसी व्यवस्था थी मिट्टी की पाइप लाइन जो पहाड़ की ऊंचाई से नीचे तक और रानी के महल तक पानी पहुंचाती थी।

यह लोग सिर्फ लड़ाके नहीं थे। ये वैज्ञानिक थे। लेकिन रुकिए, एक किला जो 9 महीने तक दुनिया की सबसे बड़ी फौज के सामने नहीं टूटा, एक रात में कैसे गिर गया? किसने खोला वो दरवाजा जो कभी नहीं खुलना चाहिए था? और उस रात गोलकोंडा के खजाने के साथ क्या हुआ? चलिए जानते हैं क्या हुआ था उस रात को जब 9 महीने की घेराबंदी के बाद भी जो किला नहीं टूटा वो एक गद्दार की वजह से एक ही रात में गिर गया और उस रात के बाद गोलकुंडा कभी वो नहीं रहा जो था
लेकिन तबाही से पहले एक सुनहरा दौर था मोहम्मद कुली कुतुबशाह कुतुबशाही वंश के पांचवें राजा जो 1580 में गद्दी पर बैठे। यह वो राजा थे जिन्होंने गोरकुंडा को सिर्फ एक किला नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे एक तहजीब में बदला। वो खुद शायर थे। उर्दू और दखनी में हजारों गजलें लिखीं। उनका दरबार शायरों, संगीतकारों और विद्वानों से भरा रहता था। लेकिन इस राजा की एक और कहानी है जो इतिहास की किताबों में कम मिलती है।

मोहम्मद कुली को एक हिंदू लड़की से प्यार हो गया। उसका नाम था भागमती। एक मुस्लिम सुल्तान और एक हिंदू लड़की उस जमाने में यह कोई छोटी बात नहीं थी। राजा ने उससे शादी की और 1591 में जब उन्होंने गोलकुंडा के पास एक नया शहर बसाया तो उसका नाम रखा भाग्य नगर भागमती के नाम पर। बाद में भागमती ने इस्लाम कबूल किया। उनका नाम हुआ हैदर महल और उसी के नाम पर वो शहर कहलाया हैदराबाद। आज 1 करोड़ से ज्यादा लोगों का शहर एक प्यार की निशानी है।
मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने सिर्फ शहर नहीं बसाया। उन्होंने एक भाषा को पाला। दखनी उर्दू, जो फारसी, तेलुगु, अरबी और हिंदी के मेल से बनी, इसी दरबार में फली-फूली। आज हम जो उर्दू बोलते हैं, उसकी जड़ें इसी गोलकुंडा के दरबार में हैं। हिंदू और मुस्लिम दोनों एक ही ज़बान में बात करते थे। एक ही दरबार में बैठते थे। एक ही संस्कृति को आगे बढ़ाते थे।

यह वह दौर था जब गोलकुंडा सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक था। लेकिन उत्तर में एक आंख थी जो गोलकुंडा [संगीत] को देख रही थी। औरंगज़ेब मुगल बादशाह था, जिसकी हुकूमत पहले से ही विशाल थी। लेकिन दक्षिण उसके लिए अधूरा था। गोलकुंडा की दौलत वो हीरे वो खजाना उसे चैन नहीं लेने देते थे। 1687 में औरंगजेब की फौज के लाखों सैनिक गोलकुंडा के बाहर आ डटी।
उस वक्त गोलकुंडा का आखिरी राजा था अबुल हसन कुतुब शाह जिन्हें लोग प्यार से तानाशाह कहते थे। तेलुगु में जिसका मतलब है ईश्वर का वरदान। अबुल हसन बहादुर थे। उनके पास किला था। किले में अनाज था, पानी था, सैनिक थे और वो किला जिसकी दीवारें अभेद्य थीं। औरंगजेब ने घेराबंदी शुरू की। 1 महीना, 2 महीने, 6 महीने, 9 महीने किला नहीं टूटा। औरंगज़ेब की फौज थकने लगी। रसद कम होने लगी। सैनिकों का मनोबल टूट रहा था। कहते हैं कि औरंगजेब खुद हताश होने लगा था।

और तब हुआ वो जो नहीं होना चाहिए था। किले के अंदर एक शख्स था। उसका नाम था अब्दुल रजाक लारी। किले का एक अमीर राजा का करीबी। उसने औरंगजेब के दूतों से संपर्क किया। सौदा हुआ और एक रात जब पहरेदार थके हुए थे। जब किले के अंदर सब सो रहे थे। अब्दुल रजाक ने किले का एक छोटा दरवाजा खोल दिया। मुगल सैनिक अंदर घुस आए। वो किला जो 9 महीने तक लाखों की फौज के सामने खड़ा रहा।
एक गद्दार की वजह से एक ही रात में गिर गया। अबुल हसन को बंदी बना लिया गया। उन्हें दौलताबाद के किले में भेजा गया। जहां वह 13 साल कैद रहे और 1704 में उसी कैद में उनकी मृत्यु हो गई। 200 साल की कुतुबशाही सल्तनत उस एक रात में हमेशा के लिए खत्म हो गई। इतिहासकार कहते हैं कि औरंगजेब के सैनिकों ने जो लूटा, वो इतना था कि उसे गिनने में हफ्ते लग गए। सोना, चांदी, जवाहरात और हीरे। वो हीरे जो गोलकुंडा की खानों से निकले थे, सदियों से इस किले के खजाने में थे।

उस रात के बाद वो हीरे अलग-अलग रास्तों पर निकल पड़े। कुछ मुगल दरबार पहुंचे। कुछ ईरान गए, कुछ अफगानिस्तान और एक सबसे कीमती वो जो गोलकुंडा की पहचान था वो एक लंबी और खूनी यात्रा पर निकला। जिस हीरे ने जिसको भी छुआ उसे बर्बाद कर दिया। लेकिन उससे पहले एक सवाल क्या वो सच में श्राप था या फिर उस हीरे के पीछे एक और सच्चाई थी जो दुनिया ने कभी जाननी नहीं चाहिए। उस हीरे की कहानी जो गोलकुंडा की मिट्टी में पैदा हुआ और जिसने जिसको भी छुआ उसे तबाह किया।
गोलकोंडा की खानों से निकला। पहले मालवा के राजाओं के पास गया। उनका राज्य छीन गया। फिर मुगल बादशाह शाहजहां के पास पहुंचा। उन्हें उनके अपने बेटे औरंगजेब ने कैद कर लिया। 1739 में नादिर शाह ने दिल्ली लूटकर इसे ईरान ले गया। कुछ ही साल बाद उसकी हत्या हो गई। अफगान शासकों के हाथ लगते ही उनकी सल्तनत बिखर गई। महाराजा रंजीत सिंह जो इसे पाने वाले आखिरी भारतीय थे

उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने पंजाब छीन लिया और 1849 में यह हीरा ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया। तब से यह लंदन के टावर ऑफ लंदन में है। एक बात गौर करने वाली है। ब्रिटिश शाही परिवार में इस हीरे को हमेशा महिलाएं ही पहनती हैं। कोई पुरुष नहीं। क्या यह उस पुरानी मान्यता का डर है कि जो पुरुष इसे पहनेगा वह बर्बाद होगा? इतिहास जवाब नहीं देता। गोलकोंडा किले से थोड़ी दूर कुतुबशाही मकबरे, सात राजाओं की कब्रें ग्रेनाइट और चूने से बनी।
इंडो-इस्लामिक और पर्शियन शैली का वो मेल जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलता। औरंगजेब ने इन्हें तुड़वाने की कोशिश की। लूटपाट हुई। लेकिन वो मकबरे आज भी खड़े हैं। और औरंगजेब का नाम इतिहास में गोलकुंडा से जुड़ा है। सिर्फ एक हमलावर की तरह। जबकि उन मकबरों में सोए राजाओं की विरासत, उनकी शायरी, उनकी भाषा, उनका बसाया हैदराबाद आज भी करोड़ों लोगों की जिंदगी में जिंदा है।

वक्त का इंसाफ हमेशा देर से आता है, लेकिन आता जरूर है। आज भारत उस हीरे को वापस मांगता है। ब्रिटेन हर बार मना करता है। तर्क यह है कि अगर एक देश को लौटाया तो दुनिया भर से मांगें आ जाएंगी। लेकिन सवाल सिर्फ एक हीरे का नहीं है। सवाल उस इज्जत का है, उस विरासत का है जो गोलकोंडा की धूल में जन्मी और आज विदेश की तिजोरी में बंद है। गोलकोंडा सिर्फ एक किला नहीं।
यह उस भारत की कहानी है जो कभी दुनिया का सबसे अमीर देश था। यह उन राजाओं की कहानी है जिन्होंने प्यार किया, लड़े, हारे। लेकिन एक ऐसी विरासत छोड़ गए जो आज भी जिंदा है। यह एक गद्दार की कहानी भी है जिसने एक रात में 200 साल की सल्तनत मिटा दी और यह उस हीरे की कहानी है जो इस मिट्टी में पैदा हुआ और जो आज भी घर वापस आने का इंतजार कर रहा है।
जब भी गोलकोंडा जाएं उन पत्थरों को एक बार छू कर देखिए। शायद वह कुछ कहे। शायद वो उन 700 सालों की वो कहानी सुनाएं जो किताबों में नहीं, पत्थरों में लिखी है।