Mehrangarh Fort History: राजस्थान का वो किला जिसे साधु ने दिया था श्राप! जानिए मेहरानगढ़ किले का रहस्य

Mehrangarh Fort History: राजस्थान राज्य के जोधपुर शहर के बीच में 400 फीट ऊंचाई पर आसमान के ऊंचाई को छूता हुआ यह मेहरानगढ़ का किला इस किले के नव राठौड़ वंश के सूर्यवंशी राजा राव जोधा जी ने 12 मई 1459 को इस किले की नीव रखी थी। इस मेहरानगढ़ दुर्ग के अंदर नकाशी दार झाकिया और यहां का यह खूबसूरत शीष महल 29 किलो सोने के लागत से बना हुआ यह प्यारा सा फूल महल और राजा और महाराजाओं की तलवार है।

जिसमें बादशाह अकबर की भी तलवार शामिल है और सोना और चांदी से बनी हुई यह पेंटिंग्स और रानियों की सोने से बनी हुई यह पालकिया यह सारी वास्तुए देख देखने के बाद आपको राजस्थानी कला और संस्कृति का एहसास होगा मेहरानगढ़ किले के इसी होली चौक में रानिया और पट रानिया अपने शाही परिवार के साथ में होली का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया करती थी और यहां पर आपको रानियों का मेकअप बॉक्स अस्त्र शस्त्र पुराने जमाने की बंदूकें इन जैसी बहुत सारी चीजें आपको इस किले में देखने को मिलती है।

Mehrangarh Fort History

आज हम आपको समूचे राजपूताने की शान मारवाड़ के मेहरानगढ़ दुर्ग का संपूर्ण सैर कराने वाले हैं। मेहरानगढ़ किले में जाने के लिए पर पर्सन ₹ का एंट्री फीज है और इसका समय सुबह 9:00 बजे से लेकर शाम के 5:00 बजे तक का है और यहां पर बहुत ही बड़ा पार्किंग एरिया बना हुआ है। मेहरानगढ़ किले के अंदर जाने से पहले मुख्य प्रवेश द्वार के पास में अपने मातृभूमि के लिए युद्ध में बलिदान देने वाले ठाकुर खेची दुर्गादास और ठाकुर चौहान श्याम सिंह जैसे महान शूरवीर योद्धाओं के याद में यहां पर आपको यह समाधि छत्रिया बनी हुई नजर आएगी।

किले के अंदर जाने के लिए आपको इस बड़े से जय पोल प्रवेश द्वार से होते हुए और इन खूबसूरत पेंटिंग्स को देखते हुए किले के अंदर प्रवेश करना होता है और किले के अंदर आते ही यहां पर बने हुए लिफ्ट के जरिए आप इस किले के सबसे ऊंचे भाग तक जा सकते हो इस मेहरानगढ़ दुर्ग को एक श्रापित किला भी कहा जाता है। क्योंकि वर्तमान में जिस जगह पर यह किला है ठीक इसी पहाड़ी के ऊपर राव जोधा जी को इस किले का निर्माण करवाना था।

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इस पहाड़ी को भाकर चिड़िया पर्वत कहा जाता था यानी कि पक्षियों का पहाड़ लेकिन इस पर्वत के ऊपर एक साधु तपस्या किया करते थे और उन साधु को बताया गया कि राजा को यहां पर किले का निर्माण करवाना है। आपको इस पर्वत को छोड़कर जाना होगा। इस बात से क्रोध में आकर साधु ने राजा को श्राप दिया लेकिन राजा ने बाद में माफी भी मांगी साधु के दिए हुए श्राप से निवारण पाने के लिए राज्य के किसी एक व्यक्ति को बलि देना जरूरी था।

तो राज्य में से राजाराम मेघवा नामक इंसान ने अपने स्वय इच्छा से इस किले के नीव में अपने प्राण त्याग दिए आज भी किले के अंदर उनके याद में यहां पर एक शिलालेख आपको नजर आएगा इसलिए इस किले को एक श्रापित किला भी कहा जाता है। इस मेहरानगढ़ के इतिहास को आपको बताते हुए यहां के पांच बड़े-बड़े प्रवेश द्वारों से चलते हुए अभी हम इस किले के राजमहल के बाहरी हिस्से में पहुंच चुके हैं और यहां पर आपको सूरज की सबसे पहले किरण के दर्शन करने वाला यह सूरज पोल प्रवेश द्वार नजर आएगा और इस प्रवेश द्वार से कुछ सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने पर आप राज महल के अंदर हिस्से में पहुंच जाओगे।

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राजमहल के इस चौकी में आपको इस चबूतरे के ऊपर रखी हुई यह संग मरमर से बनी हुई कुर्सी नजर आएगी इसी जगह पर राज परिवार के लोगों के सामने बचपन में ही राजकुमार का राज तिलक किया जाता था और यहां पर बने हुए लाल बलवा पत्थर से इन खूबसूरत झर कों को देखने के बाद अभी हम हौदा संग्रहालय में आ चुके हैं हौदा यानी कि हाथी के पीठ पर रखा हुआ राजा के लिए बनाया गया आसन राजा जब भी युद्ध और शिकार करने के लिए जाया करते थे।

तो इन लकड़ी धातु और चांदी से बने हुए हाथी के हदे को हाथी के पीठ पर बांधा जाता था और राजा इसी पर बैठा करते थे और विशेष करके यह वाला होदा रानियों के लिए बनवाया गया था।संग्रहालय के अंदर आपको यह पालकी खाना भी नजर आएगा उस जमाने में राजा और रानी एक शहर से दूसरे शहर तक जाने के लिए इन्हीं पालखी हों का प्रयोग किया करते थे जिनमें से जो पालकी ऊपर से खुली है।

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वह पालकी राजा की लिए बनाई गई है और बाकी बंद पालकिया रानी के लिए क्योंकि उस जमाने में पर्दा प्रथा चलती थी। तो रानियों को पुरुषों के नजरों से बचाने के लिए इन बंद पालखी हों का प्रयोग किया जाता था जिसमें से यह वाली पालखी सोने से बनाई गई है। अभी हम इस राजमहल के दूसरे सबसे खूबसूरत हिस्से में आ चुके हैं। जिसे श्रृंगार चौक कहा जाता है और इस श्रृंगार चौक के दूसरे मंजिल पर इस मेहरानगढ़ किले का सबसे खूबसूरत यह शीश महल आपको नजर आएगा मन को मोहित करने वाला यह शीश महल महाराजा अजीत सिंह जी का बेडरूम हुआ करता था।

जिन्होंने 1679 से लेकर 1724 तक राज्य किया था और महाराजा अजीत सिंह जी के बाद में आए हुए राजाओं ने इस कक्ष को पूजा घर और ध्यान घर में परिवर्तित कर दिया। इसीलिए वर्तमान काल में आपको इस शीश महल में सभी देवी देव देवताओं के चित्र देखने को मिलेंगे श्रृंगार चौक के निचले मंजिल पर दौलत खाना बना हुआ है। जहां पर राजा महाराजा हीरे जवाहरात यानी कि संपूर्ण राज्य की कीमती दौलत इसी जगह पर रखा करते थे और उसी दौलत में से आज आपको यहां पर यह पालकी महा ढोल देखने को मिलता है।

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सोने के पानी से बना हुआ यह पालकी महाड होल इस महाड होल को जोधपुर के महाराजा अभय सिंह जी ने गुजरात के अहमदाबाद के सूबेदार सर बुलंद खान को 1730 में युद्ध में हराकर इस महाड बोल को गुजरात से लूटकर यहां पर लाया था और यहीं पर आपको राजा महाराजाओं की युद्ध में लड़ी गई तलवारें भी नजर आएगी जिसमें से यह वाली तलवार बादशाह अकबर की है और इसके पास में ही महाराजा अजीत सिंह जी की यह दो धार की तलवार भी आपको देखने को मिलेगी।

यहां पर आपको रानियों का श्रृंगार पेटी यानी कि रानी का मेकअप बॉक्स भी देखने को मिलेगा जो कि चंदन के लकड़ी से बना हुआ है और साथ ही में सोने के नक्काशी से बना हुआ कलम दान पान दान पुराने जमाने के सिक्के और यह 40 किलो का ताला और चार चाबियां से खुलने वाला भी तालाब को देखने को मिलेगा दौलत खाने के दूसरे हिस्से में मारवाड़ के जीवन शैली को दर्शाने वाली यह सोने और चांदी से बनाई गई 18वीं शताब्दी की पेंटिंग्स आपको नजर आएगी।

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इन पेंटिंग्स को राइस पेपर पर प्राकृतिक रंगों से बनाया गया है, जिनमें सोना और चांदी शामिल हैं। पेंटिंग्स को देखने के बाद इन घुमावदार सीढ़ियों से चलते हुए जब आप ऊपर के मंजिल पर पहुंच जाओगे यहां पर आपको यह ब्यूटीफुल पैलेस ऑफ फ्लावर यानी कि फूल महल नजर आएगा। इस फूल महल को महाराजा अभय सिंह जी ने 18वीं शताब्दी में अपने मनोरंजन के लिए बनवाया था सोने के नक्काशी फूल और पत्तियों से बना हुआ यह फूल महल इसी जगह पर नृत्य मनोरंजन हुआ करता था।

और यहीं पर राजा का दीवान खास यानी कि दरबार भी भरा करता था इस फूल महल की खास बात यह है कि इस फूल महल की छत और पूरा फूल महल को बनाने के लिए 29 किलो सोनी का प्रयोग किया गया था फूल महल को देखने के बाद अभी हम मेहरानगढ़ किले के सबसे ऊंचाई पर स्थित मंजिल पर आ चुके हैं और यहां पर आपको आर्म क्शन यानी कि यह शस्त्र खाना नजर आएगा और इस शस्त्र खाने के बिल्कुल पास में सुंदरता का नायाब नमूना यह तख्त विलास महल नजर आएगा।

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शानदार नक्काशी रंगी बिरंगी काच और खूबसूरत चित्रों से बना हुआ यह तख्त विलास महल महाराजा तख्त सिंह जी ने अपने निजी शयन कक्ष यानी कि बेडरूम के तौर पर बनवाया था महाराजा तख्त सिंह जी राठौड़ वंश के 33 वें शासक थे अभी हम मेहरानगढ़ किले के अति सुंदर हिस्से में आ चुके हैं इस जगह को जनानी देवड़ी कहा जाता है इसी जगह पर शाही परिवार की महिलाएं रानियां पट रानियां रानियों की दासिया राजकुमारियां इसी जगह पर रहा करती थी।

इसलिए इस जगह को जनानी कहा जाता है और यहां पर पुरुषों का आना पूरी तरह से मना था। इस वजह से इस जगह पर किन्नर पहरेदारी करते थे। इस होली चौक में रानिया और राजा अपने शाही परिवार के साथ में बड़े धूमधाम से होली का त्यौहार मनाया करते थे और इसी जगह पर आपको इस किले का खूबसूरत यह मोती महल नजर आएगा। जिसे दीवाने खास भी कहा जाता है और इस मोती महल की छत प्योर सोने से बनाई गई है और इसकी दीवारों को चूना शंख सीपीयू के पाउडर से बनाई है और यहां पर लगी हुई।

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यह रंगी बिरंगी कांच इस मोती महल के सुंदरता को और भी चार चांद लगा देती है और इस मोती महल में राजा अपने राज्य के मंत्री के साथ में गुप्त मीटिंग्स भी किया करते थे। जिनमें रानियां दूसरों के नजर में आए बिना इन खिड़की के अंदर झरोकों में बैठकर इन मीटिंग्स के बातों को सुना करती थी और बाद में राजा को अपने राय भी दिया करती थी और यहीं पर पास में आपको इस झाकी महल में रानियों के नन्हे से जो राजकुमार और राजकुमारियां रहा करते थे।

उनके यहां पर आपको झूले भी देखने को मिलेंगे मेहरानगढ़ किले के अंदर वाले हिस्से में स्थित मंदिर का दर्शन करने के बाद अभी हम मेहरानगढ़ किले के बाहर यानी कि दूसरे हिस्से में आ चुके हैं और यहां पर आपको यह लाइन से छोटे-छोटे कमरे नजर आएंगे यहां पर यह जो कमरे हैं। इस किले के ऊपर जो तोपें रखी हुई हैं। उन तोफ को चलाने वाले लोग इन कमरों में रहा करते थे युद्ध की बिकट परिस्थिति आने पर तोफ को जल्द से जल्द रेडी करने के लिए तोफ के पास में के कमरे बनाए गए थे।

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तो इस कमरों में तोफ चलाने वाले तोफ श रहा करते थे और ऐसे लाइन से बहुत सारे कमरे यहां पर किले पर रखी गई इन तोफ के पास में से यह रास्ता बना हुआ है और यहां से 5 मिनट चलने के बाद आप मां चामुंडा के मंदिर में पहुंच जाओगे मां चामुंडा जोधपुर के राज घराने की ईष्ट देवी है राव जोधा जी ने 1459 को इस मंदिर का निर्माण करवाया था और इस मंदिर में जो प्रतिमा है। उस प्रतिमा को मंडोर से लाया गया था। और इस किले को घूमने के लिए आपको दो से तीन घंटे का समय लग सकता है और इस किले तक आप चलकर भी आ सकते हैं।