Jaisalmer Fort Histor: नमस्कार आपका स्वागत है राजस्थान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर में। थार के विशाल मरुस्थल के बीच खड़ा यह अद्भुत दुर्ग लगभग 900 वर्षों और स्थापत्य कला की गौरवशाली गाथा सुना रहा है। सन 1155 ईस्वी में भाटी राजपूत शासक रावल जैसल ने त्रिकूट पहाड़ी पर एक ऐसे दुर्ग की नींव रखी जो आने वाले सैकड़ों वर्षों से राजस्थान की शान बना हुआ है। थार मरुस्थल के मध्य स्थित त्रिकूट पहाड़ी को इसकी प्राकृतिक सुरक्षा और ऊंचाई के कारण किले के निर्माण हेतु चुना गया।
हजारों कारीगरों और मजदूरों ने कठिन परिस्थितियों में विशाल पत्थरों को पहाड़ी तक पहुंचाकर इस अद्भुत दुर्ग का निर्माण प्रारंभ किया। आश्चर्य की बात यह है कि इस किले के निर्माण में चूने या सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया। फिर भी यह आज तक मजबूती से खड़ा है। धीरे-धीरे पीले बलुआ पत्थरों से बना यह दुर्ग आकार लेने लगा और दूर से सोने की तरह चमकने लगा। जैसल द्वारा मेरू अर्थात पहाड़ी पर निर्मित होने के कारण इसका नाम पड़ा जैसलमेर।

मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने जैसलमेर की यात्रा को अत्यंत कठिन बताते हुए कहा शरीर की शरीर कीजिए काठ का पग कीजे पाषाण बख्तर कीजे लोहे का तब पहुंचे जैसाण यह केवल एक सैन्य दुर्ग नहीं था बल्कि हजारों लोगों का जीवंत निवास स्थान भी था। उदय और सूर्यास्त के समय यह दुर्ग सोने की भांति चमकता है। इसी कारण इसे स्वर्ण नगरी कहा जाता है। लगभग 900 वर्षों से खड़ा जैसलमेर का किला प्राचीन भारतीय निर्माण कला की मजबूती का जीवंत प्रमाण है।
13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत अपनी शक्ति का विस्तार कर रही थी। राजस्थान के दुर्ग उनकीत्वाकांक्षा के प्रमुख लक्ष्य बन चुके थे। उस समय जैसलमेर पर भाटी राजपूत शासक मूलराज प्रथम का शासन था। वे अपने साहस और स्वाभिमान के लिए प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि मूलराज के पुत्र रतन सिंह और तिलक सिंह ने अलाउद्दीन खिलजी के घोड़ों को पकड़ लिया और उन्हें लौटाने से इंकार कर दिया।
जब अलाउद्दीन खिलजी को इस घटना का समाचार मिला तो वह क्रोधित हो उठा और उसने जैसलमेर पर आक्रमण की तैयारी शुरू कर दी। कुछ ही समय बाद दिल्ली की विशाल सेना ने जैसलमेर किले को चारों ओर से घेर लिया। [चीखने की आवाज़] जब विजय की आशा समाप्त हो गई तब राजपूत वीरों ने केसरिया धारण किया और अंतिम युद्ध के लिए तैयार हो गए। [चीखने की आवाज़] राजपूत योद्धाओं ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।

कई वर्षों बाद दिल्ली के सुल्तान फिरोज तुगलक ने भी जैसलमेर पर आक्रमण किया। उस समय जैसलमेर पर दुर्जन साल का शासन था। उन्होंने अपने सैनिकों के साथ दुर्ग की रक्षा के लिए संघर्ष किया। फिरोज तुगलक के आक्रमण के समय जैसलमेर का दूसरा साका हुआ। जिसने राजपूताना वीरता की एक और अमर गाथा लिख दी। अफगानिस्तान के कंधार में रहने वाले अमीर अली का अपने भाई से विवाद हो गया। संघर्ष में हारने के बाद उसे अपना राज्य छोड़ना पड़ा।
अपना घर छोड़ने के बाद अमीर अली शरण की तलाश में राजस्थान के जैसलमेर पहुंचा। जैसलमेर के शासक लूणकरण ने राजपूती परंपरा निभाते हुए अमीर अली को शरण दी और उसे अपने धर्म भाई के समान सम्मान दिया। पधारिए अमीर अली। समय बीतता गया और अमीर अली तथा लूणकरण के बीच गहरी मित्रता स्थापित हो गई। लेकिन अमीर अली के कुछ साथियों के मन में लालच जाग चुका था। उनकी नजर अब जैसलमेर के किले पर थी।
एक दिन अमीर अली ने सुझाव दिया कि दोनों परिवारों की महिलाएं भी आपस में मिले। लूणकरण को यह प्रस्ताव बिल्कुल सामान्य लगा। योजना के अनुसार लगभग 150 पालकियां तैयार की गई। लेकिन उनमें महिलाओं की जगह सैनिक छिपाए गए थे। जब पालकियां किले के मुख्य द्वार पर पहुंची तो पहरेदारों को कुछ असामान्य लगा। रुको पालकी को यहीं रोको। भेद खुलने का डर होते ही सैनिक पालकियों से बाहर निकल आए और किले के प्रवेश द्वार पर हमला शुरू कर दिया।

अचानक हुए इस विश्वासघाती आक्रमण ने जैसलमेर के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। अब एक ऐसा निर्णय लिया जाने वाला था जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा। जैसे ही अमीर अली के सैनिक किले में घुसे पूरे जैसलमेर में अफरातफरी मच गई। हर किसी को समझ आ गया कि अब निर्णायक क्षण आ चुका है। महिलाओं को एकत्र किया गया। वे जानती थी कि यदि शत्रु विजय हुआ तो उन्हें बंदी बना लिया जाएगा।
परिस्थिति इतनी गंभीर थी कि जौहर की तैयारी के लिए भी पर्याप्त समय नहीं बचा था। राजपूत महिलाओं ने एक कठिन निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि शत्रु के हाथों अपमानित होने से बेहतर है सम्मान के साथ मृत्यु को स्वीकार करना। इतिहास में वर्णित है कि महिलाओं ने अपने सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। दूसरी ओर राजपूत वीरों ने केसरिया धारण किया और अंतिम युद्ध के लिए स्वयं को तैयार किया।

किले के द्वार खुले और राजपूत योद्धा अंतिम बार रणभूमि में उतरे। उनका उद्देश्य विजय नहीं बल्कि वीरगति प्राप्त करना था। क्योंकि इस घटना में पारंपरिक जौहर की अग्नि प्रज्वलित नहीं की जा सकी इसलिए इसे पूर्ण साका नहीं माना गया। इसी कारण इतिहासकार जैसलमेर में दो पूर्ण साके और एक आधा साका बताते हैं। इसलिए इसे ढाई साखों का किला भी कहा जाता है। आज भी जैसलमेर का स्वर्ण दुर्ग उन वीरों और वीरांगनाओं के बलिदान की अमर गाथा सुनाता है, जिन्होंने सम्मान और स्वाभिमान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करया