Nahargarh Fort Jaipur: जयपुर जिसे हम पिंक सिटी के नाम से जानते हैं। अपनी शाही विरासत, शानदार महलों और ताकतवर किलों के लिए दुनिया भर में फेमस है। इन्हीं शानदार जगहों में से एक है नारगढ़ किला जो अरावली की ऊंची पहाड़ियों पर शान से खड़ा है। यह किला शहर के गौरवशाली इतिहास और आर्किटेक्चर की एक शानदार कहानी कहता है। नारगढ़ नाम का सीधा मतलब है बाघों का घर, जो इस जगह की वाइल्ड और नेचुरल ब्यूटी को बताता है। यह किला सिर्फ एक मिलिट्री बेस नहीं था बल्कि एक शाही घर और शिकारगाह भी था जिसने जयपुर के महाराजाओं की लाइफ में एक बहुत इंपॉर्टेंट रोल प्ले किया है।

जयपुर सिटी सेंटर से लगभग 6 कि.मी. नॉर्थ वेस्ट में है नारगढ़ फोर्ट। किले के अंदर आने के लिए दो रास्ते हैं। जिनमें से यह रास्ता वॉकिंग के लिए है। अगर आप पैदल चलकर किले तक आते हैं, 3 से 4 कि.मी. तक चलकर आना होगा। वहीं सेकंड वाले रास्ते से आप रिक्शा से या अपनी कार लेकर ऊपर तक आ सकते हैं। किले में एंट्री टिकट की बात करें तो ₹52 प्रति व्यक्ति एंट्री चार्ज है। वहीं स्टूडेंट्स के लिए ₹26 ही है। नारगढ़ फोर्ट अपनी स्ट्रेटेजिकेंस और शानदार व्यूज के लिए जाना जाता है।

जयगढ़ किले से एक कनेक्टिव दीवार से जुड़ा हुआ नारगढ़ किला आमेर और जयपुर की राजधानी को प्रोटेक्ट करने में एक इंपॉर्टेंट रोल इसने निभाया है। इस किले को महाराजा सवाई जय सिंह सेकंड ने 1734 में बनवाना शुरू किया था जो खुद जयपुर के फाउंडर भी थे। इसका मेन मकसद जयपुर की सिक्योरिटी को मजबूत करना था। यह किला सिर्फ एक प्रोटेक्टिव स्ट्रक्चर नहीं है बल्कि आर्ट और आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन एग्जांपल भी है जिसमें राजपूत, मुगल और यूरोपियन स्टाइल का मिक्सचर देखने को मिलता है।
नारगढ़ किले का इतिहास जयपुर रियासत में बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। महाराजा सवाई जय सिंह सेकंड ने जब इस किले का कंस्ट्रक्शन स्टार्ट किया था, उस टाइम मराठा पावर बढ़ रही थी और वे राजस्थान में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे थे। जयपुर की नई बनी राजधानी को सेफ रखने के लिए नारगढ़ को बनाना जरूरी था। यह किला अरावली रेंज की सबसे ऊंची चोटियों में से एक पर था, जिससे दुश्मनों पर एक स्ट्रैटेजिक एडवांटेज मिलता था। नारगढ़ का नाम नारसिंह भूमिया नाम के एक राठौड़ राजकुमार के नाम पर पड़ा है।

जिनकी आत्मा इस जगह पर भटकती थी और किले के कंस्ट्रक्शन में रुकावट डालती थी। कहानियों के मुताबिक जब भी किले का कंस्ट्रक्शन शुरू होता था तो दीवारें अजीब तरह से गिर जाती थीं। आखिर में एक तांत्रिक ने सजेस्ट किया कि राजकुमार नारसिंह भूमिया के सम्मान में एक मंदिर बनाया जाए और किले का नाम उनके नाम पर रखा जाए। तब राजकुमार के सम्मान में एक छोटा मंदिर किले के अंदर बनवाया था और ऐसा माना जाता है कि उनकी आत्मा को शांत करने के बाद ही किले का कंस्ट्रक्शन सक्सेसफुली पूरा हुआ था।
यह स्टोरी किले को एक मिस्टीरियस और स्पिरिचुअल टच देती है। भले ही नारगढ़ फोर्ट का ओरिजिनल स्ट्रक्चर सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। लेकिन नारगढ़ में बाद के राजाओं ने काफी कुछ ऐड किया और चेंज किया। 19वीं शताब्दी में खासकर महाराजा सवाई राम सिंह सेकंड और महाराजा सवाई माधव सिंह सेकंड के टाइम में किले का बड़े पैमाने पर रनोवेशन और एक्सपेंशन हुआ था। फिर महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने किले में कई रेजिडेंशियल रूम्स और वॉल पेंटिंग्स बनवाई थीं।

उनके टाइम में यह किला ब्रिटिश रेजिडेंस और यूरोपियन विजिटर्स के लिए एक शाही गेस्ट हाउस के तौर पर यूज होता था। महाराजा सवाई माधव सिंह सेकंड ने किले में सबसे इंपॉर्टेंट स्ट्रक्चर्स में से एक माधवेंद्र भवन बनवाया था। यह एक बहुत बड़ा और खूबसूरत महल है जिसमें महाराजा और उनकी नौ रानियों के लिए नौ एक जैसे अपार्टमेंट्स बने हुए हैं। यह भवन अपने सिमेट्रिकल डिजाइन और कॉम्प्लेक्स आर्किटेक्चर के लिए फेमस है। नारगढ़ किले ने कई हिस्टोरिकल इवेंट्स देखे हैं। 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान जब ब्रिटिश ऑफिसर्स की जान को खतरा था तो जयपुर के महाराजा ने उन्हें नारगढ़ किले में शेल्टर दिया था।
जिससे उनकी सिक्योरिटी पक्की हुई थी। यह जयपुर रियासत और ब्रिटिश राज के बीच अच्छे संबंधों का एक उदाहरण था। किले पर कभी कोई बड़ा हमला नहीं हुआ और इसका मेन यूज़ एक सेफ रिट्रीट और शिकारगाह के तौर पर रहा। नारगढ़ किले का आर्किटेक्चर राजपूत और मुगल आर्किटेक्चर स्टाइल्स का एक बेहतरीन मिक्सचर है जिसमें ब्रिटिश इन्फ्लुएंस भी दिखते हैं। खासकर बाद में हुए एडिशंस में किले को रेड सैंडस्टोन और ईंटों से बनाया गया था। इसकी दीवारें मजबूत और ऊंची हैं और इसमें कई और गढ़ हैं जो किले की सिक्योरिटी को बढ़ाते हैं। किले का मेन एंट्रेंस तालेरा पोल है, जो एक बड़ा लकड़ी का दरवाजा है और जिसमें जटिल नक्काशी है।

किले की दीवारें इर्रेगुलर पहाड़ी टेरेन के हिसाब से बनी हुई हैं, जो इसे एक यूनिक और नेचुरल लुक देती हैं। यहां पर माधवेंद्र भवन नारगढ़ किले का सबसे शानदार और इंपॉर्टेंट पार्ट है। यह दो मंजिला स्ट्रक्चर है जिसमें एक सेंट्रल कोर्टयार्ड और महाराजा और उनकी नौ रानियों के लिए अपार्टमेंट्स हैं। हर अपार्टमेंट में एक छोटा आंगन, एक किचन, एक टॉयलेट और एक बेडरूम है। ये अपार्टमेंट एक-दूसरे से गलियारों से जुड़े हुए हैं। जिससे रानियां एक दूसरे से मिल सकती थी। लेकिन साथ ही उनकी प्राइवेसी भी बनी रहती थी।
इस डिजाइन को जनानी डडी कहा जाता है, जो शाही महिलाओं के रहने के लिए एक सही अरेंजमेंट दिखाता है। माधवेंद्र भवन का आर्किटेक्चर सिमेट्रिकल है और इसमें खूबसूरत वॉल पेंटिंग्स, शीशे का काम और पत्थर की नक्काशी है। माधवेंद्र भवन के ऊपर से जयपुर शहर और मानसागर झील का मनोरम व्यू दिखाई देता है जो इसे शाही परिवार के लिए आइडियल रहने की जगह बनाता था। भले ही नारगढ़ में दीवाने आम यानी पब्लिक हॉल उतना ग्रैंड नहीं है जितना आमेर पैलेस या बाकी महलों में है। फिर भी इसमें एक ऐसा एरिया है जहां महाराजा पब्लिक मैटर्स पर डिस्कशन करते थे या अपने एडवाइज़र्स से मिलते थे। पानी कलेक्ट करना किले के लिए एक इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट था।

खासकर जब एक पहाड़ी पर हो। नारगढ़ में बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए बेहतरीन सिस्टम है जिसमें यह बावड़ी है जो पूरे साल किले को पानी की सप्लाई करती है। किले में अलग-अलग तरह के आर्क और डेकोरेटिव पिलर्स हैं जो राजपूत और मुगल स्टाइल को दिखाते हैं। ट्रेडिशनल राजस्थानी आर्किटेक्चरल स्टाइल में बने किले में खूबसूरत झरोके हैं। जिनमें शाही महिलाएं बाहर का व्यू देख सकती थीं। जबकि वे खुद दिखती नहीं थीं।
किले के अलग-अलग हिस्सों में खूबसूरत छतरियां हैं जो छत पर बनी है जो किले की सुंदरता बढ़ाती है और गर्मियों में छाया देती है। यहां पर माधवेंद्र भवन और दूसरी शाही अपार्टमेंट्स की दीवारों पर खूबसूरत वॉल पेंटिंग्स देखने को मिलती है जो फूलों के पैटर्न्स, शिकार के सींस और पौराणिक कहानियों को दिखाती है। अरावली की पहाड़ी पर इसकी लोकेशन इसे एक बेहतरीन ऑब्जरवेशन पॉइंट बनाती है। किले से जयपुर शहर, जल महल, हवा महल, सिटी पैलेस और आसपास के ग्रामीण इलाकों का एक क्लियर व्यू दिखाई देता है।

यह दुश्मनों के किसी भी संभावित मूवमेंट का पता लगाने के लिए एक आदर्श जगह थी। नारगढ़ किले को जयगढ़ किले से एक लंबी दीवार से जोड़ा गया है। जयगढ़ किला जो पास की एक और पहाड़ी पर बना हुआ है जो एक ज्यादा ताकतवर मिलिट्री फोर्ट था, जिसमें तोपे और गोला बारूद रखे जाते थे। इन दोनों किलों के बीच का कनेक्शन जयपुर की डिफेंस स्ट्रेटजी का इंपॉर्टेंट पार्ट था। जिससे दुश्मनों के लिए शहर में एंटर करना मुश्किल हो जाता था। कई किलों की तरह नारगढ़ में भी इमरजेंसी सिचुएशन के लिए सीक्रेट टनल और रास्ते होने की अफवाह है।
हालांकि इसमें ज्यादातर अब पब्लिक के लिए खुले नहीं हैं या उनकी लोकेशन अननोन है। आज नारगढ़ किला जयपुर के सबसे पॉपुलर टूरिस्ट प्लेसेस में से एक है। यह किला अपने इतिहास और आर्किटेक्चर के लिए दुनिया भर से विजिटर्स को अट्रैक्ट करता है। यहां पर सनसेट पॉइंट भी बना हुआ है। जहां पर आप सनसेट को एंजॉय कर सकते हैं। और किले के अंदर शीश महल और वेक्स म्यूजियम भी बने हुए हैं। जिसकी एंट्री टिकट ₹750 है और अंदर फोटोग्राफी भी अलाउ नहीं है।

नहरगढ़ किले का यूज़ कई बॉलीवुड फिल्मों और टेलीविज़न सीरीज़ की शूटिंग के लिए किया गया है। जिसमें इसकी पॉपुलरिटी और भी बढ़ चुकी है। इसकी नेचुरल ब्यूटी और हिस्टोरिकल बैकग्राउंड इसे फिल्मिंग के लिए एक आइडियल जगह बनाते हैं। नहरगढ़ किला जयपुर के शानदार पास्ट का एक ग्रैंड सिंबल है। इसका इंप्रेसिव आर्किटेक्चर, रिच हिस्ट्री और शानदार व्यू इसे राजस्थान की विरासत के लिए एक मस्ट विजिट प्लेस बनाते हैं। नहरगढ़ एक प्रहरी के रूप में खड़ा है जो जयपुर के पास्ट की कहानियों को कहता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भव्यता को सेफ रखता है। यह किला एक रिमाइंडर है कि कैसे राजाओं ने अपने राज्यों को प्रोटेक्ट करने के लिए आर्ट, आर्किटेक्चर और मिलिट्री स्ट्रेटजी को सक्सेसफुली इंटीग्रेट किया।

