Nagmani Mystery: सदियों से इंसान नागमणि की खोज में है। नागमणि वो जादुई पत्थर जो इंसानों की सारी इच्छाओं को पल भर में पूरा कर सकता है। लेकिन यह नागमणि होती क्या है? क्या यह हिंदी फिल्मों में दिखाई गई कल्पना की तरह होती है? या यह सिर्फ एक कोरी कल्पना मात्र है? वास्तव में नागमणि के होने का दावा कई ग्रंथों में मिलता है। आइए देखते हैं आखिर क्या है। नागमणि का असली सच। कुछ अफवाहों के अनुसार मान्यता है कि जो सांप अपने जीवन के 100 वर्ष पूर्ण कर लेता है उसके फन पर एक दिव्य मणि प्रकट हो जाती है जिसे आम भाषा में नागमणि कहा जाता है।
जबकि कुछ ग्रंथों के अनुसार मान्यता है कि केवल नागराज तक्षक और नागराज वासुकी के सर अर्थात उनके फन पर ही नागमणि है। सदियों से दावा किया जाता है कि राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी ही असली नागमणि थी। लेकिन उनके मरने के बाद वो मणि कहां गायब हो गई? क्या वो आज भी उज्जैन के एक ऐसे रहस्यमई मंदिर के नीचे दफन है जिसके कपाट साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए खुलते हैं? यह राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, नागमणि और उज्जैन के रहस्यमई नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूरी कहानी है।

आज से लगभग 10,600 वर्ष पहले भारत की पावन भूमि उज्जैन पर गुप्त राजवंश के महान चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का शासन था। राजा विक्रमादित्य ना केवल अपनी न्यायप्रियता और वीरता के लिए जाने जाते थे बल्कि वे तंत्र विद्या और अलौकिक सिद्धियों के भी स्वामी थे। एक बार की बात है पाताल लोक, नागलोक पर किसी बेहद शक्तिशाली असुर या मायावी शक्ति ने आक्रमण कर दिया। नागों की पूरी प्रजाति संकट में आ गई। जब नागराज नागों के राजा को धरती पर राजा विक्रमादित्य के पराक्रम का पता चला तो वे स्वयं मानव रूप धारण कर राजा विक्रमादित्य के दरबार में मदद मांगने पहुंचे। न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य ने तुरंत नागराज की सहायता करने का निर्णय लिया।
वे अपनी जादुई सिद्धियों के बल पर राजा के साथ पाताल लोक पहुंचे। वहां राजा विक्रमादित्य ने अपनी दिव्य तलवार से उस भयानक संकट और असुर का समूल नाश कर दिया। नागलोक को एक बड़े विनाश से बचाने और इस निस्वार्थ वीरता को देखकर नागराज की आंखों में आंसू आ गए। कृतज्ञता प्रकट करते हुए नागराज ने अपने फन से ब्रह्मांड की सबसे चमकीली और दिव्य नागमणि निकाली और राजा विक्रमादित्य को उपहार स्वरूप भेंट कर दी। राजा विक्रमादित्य उस नागमणि को लेकर अपनी सांस्कृतिक राजधानी उज्जैन लौट आए। इस नागमणि का तेज इतना दिव्य था कि इसके प्रभाव से पूरे मालवा क्षेत्र का भाग्य बदल गया।
उज्जैन के शाही खजाने में इस मणि के पैर रखते ही पूरे राज्य में अकाल, भुखमरी और बीमारियां हमेशा के लिए समाप्त हो गई। लोग सुखी जीवन जीने लगे और प्रजा इतनी सुरक्षित हो गई कि पूरे राज्य में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु, सांप के काटने या किसी भी प्रकार के विष जहर से नहीं होती थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार राजा विक्रमादित्य को देवराज इंद्र से एक दिव्य सिंहासन मिला था। राजा ने उस नागमणि को उसी सिंहासन के एक गुप्त हिस्से में जड़वा दिया था। जिससे वह पूरा महल रात के अंधेरे में भी सूर्य की तरह चमकता रहता था। समय बीतता गया और राजा विक्रमादित्य का अंतिम समय नजदीक आ गया। वे एक बेहद दूरदर्शी राजा थे।

वे जानते थे कि यह नागमणि कोई साधारण रत्न नहीं है, बल्कि एक अत्यंत शक्तिशाली दिव्य वस्तु है। उनके बाद आने वाले भविष्य के राजा इसके [संगीत] तेज को नहीं संभाल पाएंगे और इंसानों का बढ़ता लालच इस मणि को हासिल [संगीत] करने के लिए महाविनाश ला सकता है। इसलिए स्वर्गलोक प्रस्थान करने से पहले उन्होंने चुपके से उस नागमणि और अपने राज्य के दिव्य खजाने को उज्जैन के महाकाल वन की भूमि के नीचे एक बेहद गहरे और अभेद्य गुप्त तहखाने में दफन कर दिया। राजा विक्रमादित्य के जाने के बाद गुप्त साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।
आने वाले 550 सालों तक उज्जैन की धरती ने भारी रक्तपात, विदेशी आक्रमण और कई राजवंशों का उतार-चढ़ाव देखा। उत्तर पश्चिम से आए क्रूर हूणों ने हमला किया जिन्हें बाद में राजा यशोधर्मन ने खदेड़ा। इसके बाद कन्नौज के सम्राट हर्षवर्धन का प्रभाव यहां रहा। आठवीं से 10वीं शताब्दी के बीच उज्जैन पर कब्जा करने के लिए उत्तर के गुर्जर प्रतिहार राजाओं और दक्षिण के राष्ट्रकूट राजाओं के बीच सदियों तक भयानक युद्ध होते रहे। इस लंबी उथल-पुथल में राजा विक्रमादित्य का वह गुप्त तहखाना और नागमणि जमीन के नीचे इतिहास के पन्नों में दफन होकर रह गए। लगभग 1050 ईसवी यानी 11वीं शताब्दी में मालवा की गद्दी पर एक और महान प्रतापी राजा बैठे जिनका नाम था परमार वंश के राजा भोज।

राजा भोज का जन्म स्वयं उज्जैन में हुआ था। वे ना केवल एक अजय योद्धा थे बल्कि वास्तुकला, आर्किटेक्चर, ज्योतिष और तंत्र शास्त्रों के प्रकांड पंडित थे। अपनी गुप्त प्राचीन गणनाओं और ग्रंथों के अध्ययन से राजा भोज को यह रहस्य मालूम हो गया कि महाकाल वन के भीतर एक विशेष स्थान के ठीक नीचे सम्राट विक्रमादित्य का वही प्राचीन गुप्त तहखाना और नागमणि दफन है। राजा भोज बेहद धार्मिक और मर्यादा पुरुष थे। उन्होंने उस नागमणि को अपने निजी लालच के लिए जमीन खोदकर बाहर निकालने का प्रयास नहीं किया। वे जानते थे कि वह धरोहर नागलोक की है।
इसलिए उन्होंने उस स्थान को हमेशा के लिए सुरक्षित करने की एक अद्भुत योजना बनाई। राजा भोज ने विज्ञान और प्राचीन मंदिर वास्तुकला का बेजोड़ तालमेल बिठाया। उन्होंने महाकालेश्वर क्षेत्र को तीन मंजिला थ्री टियर भव्य मंदिर के रूप में तैयार करवाया। सबसे नीचे भूतल यानी ग्राउंड फ्लोर पर साक्षात महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित रहे। उसके ठीक ऊपर दूसरी मंजिल पर ओंकारेश्वर महादेव की स्थापना की गई। तीन और सबसे ऊपरी यानी तीसरी मंजिल पर ठीक उसी गुप्त तहखाने की सीध के ऊपर राजा भोज ने सर्वप्रथम श्री नागचंश्वर मंदिर का गर्भगृह बनवाया।
राजा भोज ने इस मंदिर को और अधिक अलौकिक बनाने के लिए नेपाल से एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन चमकीले पत्थर की मूर्ति मंगवाई। इस अनूठी मूर्ति में भगवान शिव और माता पार्वती किसी कमल के आसन पर नहीं बल्कि 10 फन फैलाए नागराज तक्षक के आसन शेष शैया पर विराजमान हैं। इसके ठीक पीछे वो गुप्त मार्ग था जो नीचे बने विक्रमादित्य के तहखाने तक जाता था। राजा भोज ने इस पूरे मंदिर और मूर्ति को इस तरह से प्रतिष्ठित किया था कि नीचे छिपे खजाने और नागमणि की आध्यात्मिक रक्षा का भार स्वयं नागराज तक्षक संभाल सकें।

सनातन मान्यताओं के अनुसार नागराज तक्षक आज भी उस तीसरी मंजिल के नीचे अदृश्य यानी गुप्त रूप से साक्षात निवास करते हैं और विक्रमादित्य के उस गुप्त राज की रक्षा कर रहे हैं। उनके एकांत और प्रभु भक्ति में किसी भी इंसान के पैर रखने से विघ्न ना पड़े इसीलिए इस मंदिर के कपाट साल के 364 दिन पूरी तरह से लोहे के भारी तालों में बंद रखे जाते हैं। वहां किसी भी पुजारी या आम इंसान को जाने की सख्त मनाही है। केवल पूरे वर्ष में एक बार सावन महीने की नाग पंचमी के दिन इस मंदिर के पट पूरे 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं।
माना जाता है कि इस दिन स्वयं नागराज तक्षक भक्तों को दर्शन देने और शिव जी की विशेष त्रिकाल पूजा के लिए सह्ष अनुमति देते हैं। इस एक दिन यहां पैर रखने मात्र से कुंडली के सबसे भयानक सर्पदोष और काल सर्प दोष हमेशा के लिए मिट जाते हैं। इस प्रकार राजवंश भले ही अलग थे और समय में सदियों का फासला था।
लेकिन राजा विक्रमादित्य के छुपाए रहस्य को राजा भोज ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक अमर मंदिर का रूप देकर हमेशा के लिए इतिहास में अमर कर दिया। मिलते हैं अगली ऐसी ही एक रोमांचक और रहस्यमयी कहानी में।