Murud-Janjira Fort History: मुंबई से 150 और पुणे शहर से 160 कि.मी. के दूरी पर महाराष्ट्र के इस खूबसूरत राजपुरी गांव के पास में इस बड़े से अरब सागर में बसा हुआ है। यह मुरुड जंजीरा किला है। इस किले को ब्रिटिश से लेकर मुगलों तक कोई भी जीत ना सका और छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज भी इस किले को जीत ना सके। इस किले को जजीरे मेहरू यानी समंदर के पानी से घिरा हुआ किला भी कहा जाता है और इस किले के अंदर एक खुफिया सुरंग भी है और वह सुरंग इस किले के अंदर से शुरू होते हुए समंदर के अंदर से 40 से 60 फीट गहराई से यह सुरंग गुजरते हुए इस किले के पास में बने हुए इस राजपुरी गांव में निकलती है।
और इसी किले के अंदर भारत की तीसरी बड़ी तोप है छत्रपति संभाजी महाराज जिन्होंने अपने जीवन काल में एक भी युद्ध नहीं हारे थे। आखिरकार उनको इस मुरुड जंजीरा किले की मुहिम को क्यों अधूरा छोड़कर वापस जाना पड़ा? और क्यों इस 500 साल पुराने मुरुड जंजीरा किले को कोई भी जीत नहीं सका? चलिए जानते हैं कि इस किले को देखने के लिए लाखों की संख्या में लोग यहां पर आते हैं। लेकिन यहां की बहुत सारी जगहों को मिस कर देते हैं। जैसे कि यह हिस्टोरिकल जगह और यहां के खूबसूरत बीचेस और यह है पद्मदुर्ग किला।

इस किले को छत्रपति संभाजी महाराज जी ने बनवाया था। इस किले तक जाने के लिए आपको राजापुरी गांव में बने हुए इस बोट के जेटी तक आना होगा और यहां पर ₹100 पर पर्सन बोट का टिकट निकालकर इस लकड़ी से बने हुए सेलिंग बोट में बैठकर समंदर को एंजॉय करते हुए आपको किले के पास में जाना होता है और यहां पर सुबह की सबसे पहली बोट 8:30 बजे स्टार्ट हो जाती है
इस मुरुड जंजीरा किले को इस समंदर में कुछ इस तरह से बनाया गया है कि दुश्मन की सेना और आप जब तक इस किले के पास में यानी कि इन सीढ़ियों के पास में जब तक आप पहुंच नहीं जाते तब तक आपको इस किले का यह मुख्य प्रवेश द्वार बिल्कुल भी नजर नहीं आता। 22 एकड़ में बने हुए इस किले के इतिहास काल के समय में इस किले के अंदर रहने वाला कोई भी व्यक्ति जब इस मुख्य प्रवेश द्वार से बाहर की तरफ जाता तो उसे इस राज्य का सिंबल बना हुआ एक सिक्का दिया जाता यानी कि एक मुद्रा और वह मुद्रा दिखाने के बाद ही उन्हें वापस अंदर लिया जाता था।

अगर किसी के पास में इस राज्य की वह मुद्रा नहीं होती थी, तो उसे दुश्मन या जासूस समझकर इसी मुख्य प्रवेश द्वार पर तलवार से उसकी गर्दन छाटकर इसी समंदर में उसे फेंक दिया जाता था। इस किले के अंदर आते ही सबसे पहले आपको इस किले में रखी हुई ये तीन बड़ी तोपें नज़र आती हैं। जिसमें से यह है भारत की तीसरी बड़ी तोप कलाल बांगड़ी। और इस तोप का वजन 22 टन है और इस तोप को पंचधातु में बनाया गया है।
इसीलिए यह तोप कड़ी धूप में चलाने के बावजूद भी कभी भी गर्म नहीं होती है और इस तोप की मारक क्षमता 10 से 12 किलोमीटर की है और इस तोप को किले के बाहर से अलग-अलग हिस्सों में लाकर यहां पर बनाया गया है। और इस कलाल बांगड़ी तोप के पास में गायमुख और लांडा कासम नाम की दो अन्य तोपें भी आपको नज़र आएंगी। इन दो तोपों की मारक क्षमता 4 से 6 कि.मी. है और इनका वजन 7 से 8 टन है। अभी हम इस किले के दूसरे मंजिल के अंदर आ चुके हैं और इस किले को तीन मंजिल में बनाया गया है और इस किले में लगभग 90 फीट के 22 बुरज यानी वॉश टावर बने हुए हैं।

और इन वॉश टावरों के अंदर सैनिक रहकर यहां से समंदर पर निगरानी रखकर इस किले की सुरक्षा करते थे। और इस आर्चनुमा आर्किटेक्चर को और इन सभी पिलर्स को कुछ इस तरह से बनाया गया है कि इनके ऊपर रखे हुए इस 22 टन वजनी तोप को और अन्य तोप के वजनों को भी यह आसानी से झेल सके। चारों तरफ से समंदर के खारे पानी से घिरे रहने के बावजूद भी इस किले के अंदर आपको यह दो मीठे पानी के तालाब नजर आएंगे।
इस किले में रहने वाले राज परिवार के लोग और यहां पर कोहली समाज के और मुस्लिम समाज के जो 3000 लोग रहा करते थे वह इसी तालाब के पानी का प्रयोग किया करते थे और इस बड़े से तालाब में तो बादशाह ने अपने रानी के लिए खूबसूरत सा शीश महल भी बनवाया था जो अभी पूरी तरह से नष्ट हो चुका है और इस किले के मध्य भाग में आपको राजा के महल के कुछ अवशेष भी नजर आएंगे। किसी जमाने में यहां पर सात मंजिलों का आलीशान राजा का महल हुआ करता था। इस जगह पर जब यह किला बना भी नहीं था

उस वक्त सबसे पहले यहां पर कोहली समाज के राजा रामराव जी पाटिल सरदार यहां पर कुछ लोगों के साथ में लकड़ी का कच्चा परकोटा बनाकर रहा करते थे और उस वक्त यह इलाका अहमदनगर के निजामशाही के कंट्रोल में आता था। कोहली सरदार राजा रामराव जी पाटिल ने इस जगह को खाली करने के निजामशाही के आदेश का इंकार कर दिया था। इस वजह से आर्मी जनरल पीरम खान ने कोहली सरदार के इस मेडकोट में छल और कपट से अंदर जाकर सभी का कत्ल कर दिया था।
और उसके बाद में निजामशाही ने इस जगह को सिद्धियों के हवाले कर दिया था। तो इस तरह से सिद्धि जौहर ने इस जगह पर आज से 550 वर्ष पूर्व इस किले का निर्माण कराया था और इस किले को बनने में 22 साल का समय लगा था। यहां पर सबसे बुरी बात यह है कि इस पूरे किले को घूमने के लिए आपको केवल 45 मिनट का समय दिया जाता है। 5 मिनट तो टिकट निकालने में ही जाते हैं। समय बहुत ही कम है और इस किले में आने के लिए ₹25 प्रति व्यक्ति एंट्री फीस ली जाती है।

यह है पद्मदुर्ग किला और इस किले को छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने 1675 में बनवाया था। क्योंकि वे मुरुड जंजीरा किले को जीतने में असफल हो रहे थे और समय भी निकल रहा था। तो उन्होंने इस मुरुड जंजीरा किले से 5 किलोमीटर के दूरी पर इस खूबसूरत मुरुड बीच से समंदर के अंदर 2 किलोमीटर में इस पद्म दुर्ग किले का निर्माण करवाया था ताकि वह इस किले से मुरुड जंजीरा किले के साथ ही में इस समंदर में होने वाले गतिविधियों पर ध्यान रख सके और छत्रपति संभाजी महाराज जी ने इसी किले से मुरुड जंजीरा किले को जीतने की योजनाएं बनाई थी
और उन्होंने समंदर के अंदर एक सेतु भी बनाया था और किले में रहने वाले जब सिद्धियों को ऐसा लगा कि छत्रपति संभाजी महाराज इस मुरुड जंजीरा किले को जीत ही ले गए तब सिद्धियों ने मुगलों से सहायता ली और मुगलों ने जानबूझकर राजधानी रायगढ़ पर हमला कर दिया। तो इसी वजह से छत्रपति संभाजी महाराज जी को इस मुरुड़ जंजीरा किले के मुहिम को अधूरा छोड़कर वापस अपनी राजधानी बचाने के लिए रायगढ़ जाना पड़ा। वरना छत्रपति संभाजी महाराज इस किले को जीतकर मराठा साम्राज्य में शामिल करने ही वाले थे।

अगर आपको मुरूट बीच से पद्मदुर्ग किले तक जाना है तो आप सैटरडे संडे आना तब यहां पर ज्यादा लोग रहते हैं क्योंकि लोग कम होते हैं तो बोट वाला वहां तक नहीं जाता है। राजापुरी गांव से 1.5 कि.मी. के दूरी पर यह है खूबसूरत हिस्टोरिकल जगह। इस जगह को खोखरी गुंबद या फिर खोखरी थॉम्स भी कहा जाता है। यह जगह सिद्धियों के शासनकाल में उनके राज परिवार के लोगों का कब्रिस्तान हुआ करता था और जैसे ही आप इस जगह के अंदर आ जाते हो यहां पर आपको यह खूबसूरत सी बड़ी सी गुंबद वाली कब्र नजर आएगी।
इस मकबरे के अंदर सूरल खान की कब्र है। सूरल खान ने 1707 से लेकर 1734 तक शासन किया था। और इस बड़े से मकबरे के सामने आपको ये दो छोटे मकबरे नज़र आएंगे। इन दोनों कब्रों में खैरियत खान और सिद्दीक आसिम खान की कब्रें हैं। इन्होंने भी किसी जमाने में यहां पर शासन किया था। और इस पूरे मकबरे को पत्थर से इंडो-सेल्यूसिड शैली में बनाया गया है। और यह जगह बहुत ही खूबसूरत है। इस जगह को आपको जरूर विजिट करना चाहिए। हम नंदगांव बीच की ओर जा ही रहे थे कि रास्ते के बीच में हमें यह खूबसूरत सा जंजीरा पैलेस नजर आया।

यह पैलेस जितना बाहर से खूबसूरत है, इससे कहीं ज्यादा यह अंदर से खूबसूरत है। लेकिन इस पैलेस के अंदर टूरिस्ट का जाना बिल्कुल भी अलाउड नहीं है। तो इस पैलेस को आप बाहर से ही देख सकते हैं। और यह है अलीबाग का सबसे क्लीन और ब्यूटीफुल नंदगांव बीच। और इस बीच की पहचान है ये ऊंचे-ऊंचे कोकोनट ट्रीज जो कि इस बीच की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। और यह बीच मुरूड जंजीरा किले से 14 कि.मी. के दूरी पर है और अलीबाग से 40 कि.मी. के दूरी पर है। और यह नंदगांव बीच पूरे 2.5 कि.मी. से भी ज्यादा लंबा है।
और अभी यहां पर दोपहर का समय है। इसलिए यहां पर आप देख सकते हैं कि हमारे अलावा कोई भी नजर नहीं आ रहा होगा और अभी अप्रैल का महीना चालू है। ऊपर से गर्मी भी है लेकिन यहां पर ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही है और नंदगांव बीच के पास में ही यह खूबसूरत सा सिद्धि विनायक मंदिर भी है। इस मंदिर में जाकर आप गणेश जी के दर्शन जरूर करें। तो इस ब्लॉग को हम यहीं पर एंड करते हैं। अगर मेरा यह वीडियो आपको अच्छा लगा तो वीडियो को लाइक करना, कमेंट जरूर करना और मिलते हैं आपको नेक्स्ट वॉग में।

